(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 158

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जरूरी भी हैं। मैं केवल एक उदाहरण दूंगा। परंपरागत तलाक के उन्मूलन से बम्बई प्रांत की ग्रामीण जनता को काफी परेशानी होगी, क्योंकि वहां के लोगों में तलाक की प्रथा काफी प्रचलित है। बम्बई में तलाक कानून है, लेकिन उस कानून में भी प्रथागत तलाक एक अपवाद है। अतः मेरा यह कहना है कि कुछ संशोधन आवश्यक हैं। तलाक, विवाह और गुजारा भत्ता तथा अल्पसंख्यक सम्बन्धी प्रावधान अधिनियमित किये जायें। मुझे उनके बारे में कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु मैं भाग 5, 6 और 7 में अन्तर्विष्ट प्रावधानों का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हूँ। उनसे मूलभूत परिवर्तन होते हैं। वास्तव में उनसे हिंदू समुदाय के सभी दाय कानून बिखर जाते हैं। अतः प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे बिखराव के लिए यह समय उपयुक्त है। हम ऐसी राजनैतिक और आर्थिक स्थिति की मंझधार में हैं, जिसमें अशांति, विक्षोभ, दुर्गति और विघटन व्याप्त है। अतः प्रश्न यह है कि क्या हमें ऐसे क्रांतिकारी परिवर्तन करके स्थिति को और अधिक जटिल बनाना चाहिये, जो देश के समूचे सामाजिक ढांचे को प्रभावित करता है। हमारे प्रधान मंत्री प्रायः कहते हैं और उनका कहना ठीक है कि इस आपातकालीन स्थिति में पहली चीज़ें पहले आनी चाहिये और यह समय ऐसी चीज़ों के लिए नहीं हैं जिससे विघटन होता हो। यदि आप इस कसौटी के आधार पर इस कानून को परखते हैं तो परिणाम क्या होगा? मैं पूछता हूँ कि क्या ये प्रावधान इतने जरूरी हैं कि हमें पहले से मुश्किल स्थिति को और मुश्किल बनाने का जोखिम ले लेना चाहिये? उत्तर स्पष्ट है। हिंदू कानून कई वर्षों से प्रचलन में है और इसे बदला जाना है या इसे संहिताबद्ध किया जाना है, तो इस समय इसकी आवश्यकता नहीं है। विद्यमान कानून को इस प्रकार बिखेरने के लिए यह सही अवसर नहीं है।

यह हमारा अनुभव है कि जो विधान जनमत से पूर्व बनाया जाता है वह असफल रहता है। मैं इसमें न केवल मुखर शहरी लोगों को अपितु देहातों के करोड़ों लोगों को भी शामिल करता हूँ। हमें यह देखना है कि क्या यह विधान, जनमत से पहले बनाया जा रहा है। हमें शारदा कानून का अनुभव है। उसके प्रावधान कठोर होने के बाजवूद उसे लागू नहीं किया जा सकार। उसी तरह के मामलों में तो यह कानून निष्फल ही नहीं होगा, अपितु इसके भाग पांच, छः और सात में अन्तर्निहित प्रावधानों के परिणाम बहुत ही घातक रहेंगे।

देहातों में ऐसे गुंडे हैं, जो अपनी कानून की विस्तृत जानकारी के बल पर ग्रामीणों के अज्ञान का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करते हैं और उन्हें धोखा देकर लम्बी मुकदमेबाजी में डाल देते हैं। यह बुराई पहले से ही व्याप्त है। विरासत अथवा उत्तरजीविका का प्रयोग काफी समय से होने और लोगों को इसकी जानकारी होने के कारण गांवों के लोग पहले ही से इसके बारे में जानते हैं। अब परिणाम यह होगा कि गांवों के गुंडों को ग्रामीणों के अज्ञान का अनुचित लाभ उठाने का एक और अवसर मिल जायेगा। अतः मैं यह आग्रह करना चाहता हूँ कि यद्यपि मैं सुधार का विरोधनी नहीं हूं, इस प्रकार का विधान स्थापित करने के लिए यह उचित अवसर नहीं हैं।