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लेकिन मेरी कुछ शिकायतें हैं। यह कानून उतना प्रगतिशील नहीं है जितना कि इसे होना चाहिये और यह जनता की अपेक्षाओं के भी अनुकूल नहीं है। यह कई पहलुओं में मरूमाकट्टायम कानून से, जो इस समय देश के उस भाग में जहां हम रहते हैं, विद्यमान है, काफी पीछे हैं। जिस स्थिति में हम इस समय हैं, उससे नीचे हमें नहीं गिरना चाहिये। यदि विधेयक में संशोधन लाये जा सकें और विधेयक का प्रयोग करना हमारे लिए भी संभव हो सके, तो हमें सबसे अधिक खुशी होगी।
इस समय विधेयक के जो प्रावधान हैं वे पैतृक दृष्टि से सोचे गये हैं। मातृ विधि पद्धति के प्रावधान, जहां कहीं वे प्रगतिशील हैं, इस विधेयक में शामिल किये जा सकते हैं पर उस दृष्टिकोण का कोई ध्यान नहीं रखा गया है। यह कहा जा सकता है कि 1947 में मसौदा तैयार किये गये मूल विधेयक में मरूमाकट्टायम और ऐलिया संथानम को विधियों की उन सभी महत्वपूर्ण शाखाओं के संचालन से बाहर रखा गया था, जो इसमें शामिल की गई हैं। मैं यह बताना चाहता हूँ कि यह विधेयक पर्याप्त प्रगतिशील क्यों नहीं है और इसे अधिक प्रगतिशील क्यों बनाया जाये।
मरूमाकट्टायम विधि के अन्तर्गत विवाह एक नितान्त सांसारिक मसला है। इसमें धर्म की कोई बात नहीं है। इसमें अलंधनीयता या पवित्रता की भी कोई बात नहीं है। हिंदू संहिता विधेयक में दो प्रकार के विवाहों को मान्यता दी गई हैµसांस्कारिक विवाह और कानूनी विवाह। कानूनी विवाह आम है और हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। हम इससे सम्बन्धित प्रावधानों का पालन करने के लिए तैयार हैं।
संहिता के लेखकों को यह गलतफहमी थी कि मरूमाकट्टायम विवाह भी सांस्कारिक थे, यह बात विधेयक के खंड 51 के एक पाठ से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें उन्होंने कहा है कि मालाबर विवाह भी सांस्कारिक है। इसी आधार पर उन्होंने इस खंड का प्रारूप तैयार किया है। मालाबर में विवाह का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। खंड 51 का पाठ इस प्रकार हैःµ
फ्इस भाग में अन्तर्विष्ट किसी बात का अर्थ यह नहीं होगा कि वह एक सांस्कारिक विवाह, चाहे वह इस संहिता से पूर्व किया गया हो अथवा बाद में, के विघटन के प्रयोजनार्थ मद्रास मरूमाकट्टायम अधिनियम, 1932 (1932 का मद्रास अधिनियम 22) द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार को प्रभावित करती है।य्
जहां तक हमारा सम्बन्ध है, एक और ऐसी दशा है जिसमें हम इस विधेयक में संशोधन करवाना चाहेंगे। हमारा कानून हमें अपने पिता की भतीजी या अपने मामा की लड़की से विवाह करने की इजाज़त देता है। वास्तव में हममें से बहुत से लोग अपने मामा/चाचा की लड़की या अपने बाप की भतीजी से विवाह करना गौरब की बात समझते हैं। किन्तु ऐसा करना पवित्र तथा निषिद्ध सम्बन्धों के संबंधित प्रावधानों के अन्तर्गत