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भी रहा है। यदि इस दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखा गया होता, तो इनमें से अनेक मतभेद दूर अथवा कम हो गये होते।
संयुक्त परिवारिक सम्पत्ति के सम्बन्ध में संयुक्त अभिधारणा (ज्वॉइन्ट टेनेन्सी) के स्थान पर सामान्यिक अभिधारणा (टेनेन्सी-इन-कॉमन) का प्रावधान इस विधेयक का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है। मैं इसका स्वागत करता हूँ किन्तु यह विधि भी पित्तृसत्तात्मक दृष्टिकोण से ही बनाई गई है। भाग पांच का कोई खंड पढि़येµमैं सभा को कष्ट नहीं दूंगा किन्तु मैं इसे केवल माननीय विधि मंत्री के ध्यान में लाना चाहता हूँµभाग पांच का कोई खंड पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि यह मरूमाकट्टायम लोगों पर लागू नहीं होता, यद्यपि हिंदू संहिता विधेयक उन पर भी लागू होने का प्रावधान है।
खंड 86, 87 और 88 खंडों से पता चलेगा कि उनमें से कोई भी खंड सामान्यिक अभिधारणा (टेनेन्सी-इन-कॉमन) के मामले में लागू नहीं किया जा सकता जिसे मालाबर में विद्यमान संयुक्त परिवारों के मामले में लागू किया जा रहा है।
विरासत के मामले में, मैं नहीं समझता कि बेटे और बेटी के साथ माँ को भी वारिस क्यों न बनाया जाये। मान लें कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैµमान लें मेरी मृत्यु हो जाती है। तो मेरा प्राकृतिक प्यार और स्नेह मुझे तेरी मां को देखने के लिए प्रेरित करते हैं जिसने मेरा पालन-पोषण किया है और जिसने मेरे पूरे जीवन में मुझमें दिलचस्पी ली है और मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी माँ को अपनी सम्पत्ति का वारिस बनाऊं। यहां मुझे पता चलता है कि खंड एक में माँ का उल्लेख नहीं किया गया है।
मेरी दूसरी शिकायत यह है कि एक पूर्वमृत बेटे या एक पूर्वमृत बेटे के बेटे के बेटे को वर्ग एक में सम्मिलित किया जाये। उसे वर्ग दो में सम्मिलित किया जाना चाहिये। हमारे लिए यह आपत्ति की बात है कि उन्हें वर्ग एक में अधिमान्य वारिसों के रूप में रखा जाये। यदि आप मालाबर में किसी से पूछें कि क्या वह चाहेगा कि उसकी सम्पत्ति उसके बेटे के पूर्वमृत बेटे के बेटे या उसके बेटे के बेटे या उसकी बहन या बहन के बच्चों को दी जाये, तो वह निश्चित रूप से कहेगा कि उसकी सम्पत्ति भाई के बजाय उसकी बहन और बहन के बच्चों को दी जाये। अतः मेरा कहना यह है कि सातवीं अनुसूची के वर्ग दो में बहन और उसके बच्चों को जो स्थान दिया गया है, उसे ऊपर उठाया जाना चाहिये। बहन और बहन के बच्चे बहुत नीचे आते हैं_ सातवीं अनुसूची में वे बेटे की बेटी के बेटे, बेटे के बेटे की बेटी, बेटे की बेटी की बेटी के बाद आते हैं। अन्ततः हम इन व्यक्तियों को ही पाते हैं और भाई तथा बहन को भी वारिस के रूप में पाते हैं। मेरी समझ में यह नहीं आता कि उस भाई और बहन को ऊंचा स्थान क्यों न दिया जाये तो उसी मां से पैदा हुए हैं। निश्चित रूप से प्राकृतिक प्यार और स्नेह से प्रेरित होकर हमें भाई और बहन को उससे ऊंचा स्थान देना चाहिये, तो विरासत सम्बन्धी वर्तमान प्रावधानों के अन्तर्गत उन्हें दिया गया है।