148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(इस समय उपाध्यक्ष महोदय ने कुर्सी खाली की, जिस पर तत्पश्चात् श्रीमती जी. दुर्गाबाई (सभापति तालिका में से एक) आसीन हुईं)
इन सभी पहलुओं से इस प्रश्न पर विचार करने से पता चलेगा कि पूरा विधेयक मालाबर को छोड़कर देश के अन्य भागों में विद्यमान कानून पर आधारित है, जो निस्संदेह निश्चित रूप से अधिकतम लोगों द्वारा अमल में लाया जाता है। किन्तु यह विधेयक तैयार करते समय मातृ सत्तात्मक विधि पद्धति का कोई ध्यान नहीं रखा गया है। अतः मैं महसूस करता हूं कि यह विधेयक महिलाओं के अधिकारों के मामले में, जो हम सभी को उन्हें देने की बड़ी आकांक्षा है तथा सामान्य दृष्टिकोण से भी, पर्याप्त प्रगतिशील नहीं है।
इस विधेयक के क्षेत्राधिकार में लाये जाने की हमारी बड़ी आकांक्षा है। हम निश्चित रूप से एकरूपता चाहते हैं। मैं तथा देश के हमारे क्षेत्र के लोग भी चाहते हैं कि देश में सभी हिंदुओं के लिए एक समान कानून हो। किन्तु हम यह भी चाहते हैं कि कानून इतना भी क्रांतिकारी अथवा ऐसा न हो कि लोग उसका पालन भी न कर सकें या उसका पालन करने में उन्हें कोई आनाकानी हो। इसे आकर्षक बनाया जाना चाहिये। मेरा अनुरोध है कि कानून बनाते समय मातृ-सत्तात्मक विधि पद्धति का भी ध्यान रखा जाये। मेरा यह निवेदन है कि विधेयक में समीचीन संशोधन किये जायें, जिससे हम भी विधेयक के क्षेत्राधिकार में आ जायें। यदि किसी कारण से दो पद्धतियां इतनी भिन्न हों कि हमें विधेयक के क्षेत्राधिकार में लाने के लिए विधेयक में संशोधन करना असंभव हो, तो मैं सभा से अनुरोध करूंगा तो कि हमें अकेले रहने दिया जाये। हमें अपने कानून का पालन करने की इजाज़त दी जाये, जिसमें इस सभा में पेश किये गये हिंदू संहिता विधेयक की अपेक्षा प्यार और स्नेह का उच्च स्थान है। मैं तो यह कहूँगा कि यह हिंदू संहिता विधेयक धर्मनिरपेक्ष विधान नहीं है, यह युक्तियुक्त उपाय नहीं है_ अभी भी विधेयक में धर्म की झलक है। यह विधेयक पूर्णतया युक्तियुक्त होना चाहिये। मुझे कोई आपत्ति नहीं होती यदि पूरा विधेयक प्राकृतिक दृष्टिकोण से लाया गया होता, जिससे धर्म को पूरी तरह दूर रखा गया होता। यदि ऐसा कोई विधेयक पेश किया जाता है, तो हमारे लोगों को इसका पालन करने में बहुत खुशी होगी। हमें यह दिखाई देता है कि वर्तमान रूप में विधेयक पर धर्म की काफी छाप है_ यद्यपि इस पर धर्म का प्रभाव कम करने का प्रयास किया गया है, तो भी यह पर्याप्त धर्मनिरपेक्ष नहीं है। मेरी समझ में नहीं आता कि विवाह, दत्तक ग्रहण और विरासत में धर्म का हस्तक्षेप क्यों हो, उनसे सम्बन्धित प्रावधानों को देश के हमारे क्षेत्र में इस समय लागू कानून के प्रावधानों की तरह अधिक धर्मनिरपेक्ष क्यों न बनाया जाये? इसका कोई कारण नहीं है कि हम जो ऐसी पद्धति का पालन करते हैं जिस का इन सांसारिक मामलों में धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे विधेयक के क्षेत्राधिकार में क्यों आयें, जिसमें धर्म की विशेष भूमिका है।