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जहाँ तक संविधान का सम्बन्ध हैं, हमने महिलाओं और पुरुषों में समानता स्वीकार की है, लेकिन यहां हम अपनी महिलाओं, अपनी बहनों और बेटियों को वह समानता देने में आनाकानी कर रहे हैं। आप किसी परिवार के एक लड़के को केवल इसलिए गोद ले सकते हैं कि उसका वही गौत्र या वही उपनाम है, लेकिन आप अपनी बेटी या अपनी रिश्ते की बहन को सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि वह एक महिला है। यही स्थिति है।
यह कहकर विधेयक के बारे में काफी तूफान खड़ा किया गया है कि यह हिंदू धर्म पर एक कलंक है। मैं अपने मित्रों से यह कहना चाहता हूँ कि हिंदू धर्म काफी सहनशील और समन्वय स्थापित करने वाला है। इसने प्राचीन काल से बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढाला है। इस का सबसे बड़ा सबूत 137 या 138 स्मृतियां हैं, जो इस बात का प्रमाण है। यदि कोई एक कानून होता और हिंदू कानून में किसी परिवर्तन का सुझाव न दिया गया होता अथवा आशा नहीं की गई होती, तो 138 स्मृतियां क्यों होतीं और हम एक और स्मृति क्यों नहीं बना सकते, संहिताबद्ध कर सकते और नया कानून बना सकते? हम इसमें उन स्मृतियों की सभी अच्छी चीज़ों का समावेश कर सकते हैं, जो आधुनिक समय और वैज्ञानिक घटनाओं तथा सामाजिक प्रगति की मांग है। यदि हम इन सभी को एक कानून में संहिताबद्ध करते हैं तो उसमें क्या बुराई है। स्मृति शब्द का अर्थ है कि जो कुछ स्मृति के आधार पर लिखा जाये, श्रुति शब्द का अर्थ है कि जो कुछ सुन कर लिखा जाये। यह कहीं नहीं लिखा है कि उन्हें किसी एक विशेष ऋृषि या एक विशेष मुनि ने लिखा था। अतः मैं नहीं समझता कि ऐसी संहिता बनाने में कोई हिचकिचाहट होनी चाहिये और न ही किसी को यह महसूस करना चाहिये कि उसकी हत्या की जायेगी यदि ऐसी हिंदू संहिता बनाई जाती है। हम हमेशा राजनैतिक मंच से स्वाधीनता की बात करते रहे हैं। राजनैतिक स्वतंत्रता मिल गई है। लेकिन हमें यह भी देखना है कि देश का सामाजिक विकास भी हो। यदि हम चाहते हैं कि सामाजिक व्यवस्था बदले, तो मैं कहूंगा कि इसे बदलने का यही समय है। हमें अपने कर्मों द्वारा न कि अपनी कथनी द्वारा इसे सिद्ध करना होगा। हमें यह देखना होगा कि पूरी सामाजिक व्यवस्था बदले। जहां तक सुधार का सम्बन्ध है, मैं यह कह सकता हूं कि स्वर्गीय राजा राम मोहन राय को भी विरोध का सामना करना पड़ा, कई अन्य सुधारकों को विरोध का सामना करना पड़ा, उनमें से कुछ की अपने विरोधियों के हाथों ही, जिनकी वे सहायता करना चाहते थे, जिनकी स्थिति वे सुधार लाना चाहते थे और जिन्हें वे मुक्ति दिलाना चाहते थे अस्वाभाविक मृत्यु हो गई। यहां हमें नेता मिल गए हैं, जो निश्चित रूप से हमारे साथ हैं। अधिवेशन के पहले दिन प्रधानमंत्री के भाषण के बाद मैं नहीं समझता कि इस मामले में यहां तर्क देने के लिये कोई चीज़ रह गई है या झगड़ने के लिए कोई मुद्दा है जब उन्होंने यह कह दिया कि वह सभी की राय से कानून बनाना चाहेंगे यदि यह राय कायम हो सकी। यदि