154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिंदू संहिताµजारी
ऽमाननीय उपाध्यक्ष ः अब सभा हिंदू विधि के कतिपय प्रावधानों का संशोधन करने तथा उन्हें संहिताबद्ध करने वाले विधेयक पर आगे विचार करेगी।
श्री अल्लादी कृष्णस्वामी अय्ययर (मद्रासः सामान्य)ः महोदय, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित विधेयक के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने से पूर्व मैं आपकी अनुमति से कुछ सामान्य टिप्पणियां करना चाहूंगा। मैं एकदम यह कह सकता हूँ कि मैं उन लोगों के साथ नहीं हूँ, जो हिंदू विधि के मामलों में विधायी हस्तक्षेप या परिवर्तन के विरुद्ध हैं। कानून अपने स्वभाव सें गतिहीन नहीं हो सकता_ इसे सभा की प्रगतिशील प्रवृत्तियों के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिये, यदि उसे सामाजिक प्रगति का एक साधन तथा उपाय बनाना है। समाज में विधि के इस कृत्य के प्रति हमारे पूर्वज काफी सजग थे। स्मृतियां तथा स्मृतियों पर की गई महान टीकायें समाज में कानून के इस कृत्य और समय-समय पर परिवर्तनों की आवश्यकता का स्पष्ट प्रमाण हैं। ये टीकायें, जिन्हें देश के विभिन्न भागों में कानून की प्राधिकृत व्याख्या समझा जाता है मुश्किल से ही प्रमाण देती हैं, उस समय की सामाजिक प्रवृतियों के कार्य का किन्तु आधुनिक समय में, जब कि विधिवत गठित विधानांग कार्यरत हैं। केवल व्याख्या के आधार पर कोई विधिवेता कानून में परिवर्तन नहीं कर सकता। यह कार्य कुछ हद तक किन्तु सीमित क्षेत्र में पिछले करीब एक सौ वर्षों में न्यायालयों, भारत के उच्चतम न्यायाधिकरणों तथा प्रिवी परिषद की न्यायिक समिति द्वारा किया गया है। तथापि कानून में परिवर्तन लाना सामान्य रूप से न्यायालयों का काम नहीं है। न्यायालयों का काम तो कानून की व्याख्या करना है यद्यपि व्याख्या की प्रक्रिया में न्यायालयों द्वारा पूर्ववर्ती निर्णयों अथवा हिंदू विधि पाठों में विभेद करके अथवा सिद्धान्त स्थापित करके दृश्य परिवर्तन किये जा सकते हैं।
तथापि अपने स्वभाव से न्यायालय का काम सीमित है। इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि न्यायाधीश जाने अथवा अनजाने में एक विधायक की भूमिका ग्रहण कर सकता है। एक विशेष न्यायाधीश या न्यायपीठ एक प्रश्न पर दकियानूसी अथवा रूढि़वादी दृष्टिकोण से विचार कर सकती है, दूसरा न्यायाधीश अपने न्यायिक कृत्य का प्रयोग किसी प्रिय सामाजिक सुधार के लिये कर सकता है। इस देश में उच्चतम न्यायाधिकरण के निर्णय तथा भारत के साथ अपने लम्बे साहचर्य के दौरान प्रिवी परिषद की न्यायिक समिति के निर्णय उपरोक्त उक्ति का प्रमाण हैं। इसके साथ-साथ इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि न्यायालयों के निर्णयों ने काफी हद तक विधायी हस्तक्षेप के लिए भूमि तैयार की है। यद्यपि विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता स्पष्ट है,
ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 13 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 510-19