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यह सभा इस प्रकार का विधान बनाते समय विवाह, पारिवारिक विधि और उत्तराधिकार के अधिकारों के बारे में व्याप्त कतिपय धारणाओं की अनदेखी नहीं कर सकती। परिवर्तन अवश्यंभावी है और समाज की मूलभूत विधि का अंग हैं, किंतु परिवर्तन का अर्थ समाज की जड़ों अथवा नींव पर कुठाराघात करना नहीं है।
कानून में सुधार के इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मैं इस सभा से इस विधेयक पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ। ऐसा कोई अन्य विषय नहीं है जिसमें इस देश के सभी पुरुषों और महिलाओं की इस समय सभा के विचाराधीन विधेयक से अधिक दिलचस्पी हो। इस दृष्टि सें हमारे लिये और भी जरूरी हो जाता है कि जो भी हो, हम मतभेदों को सहन करें और इस देश के लोगों की खुशहाली के हित में शांत और निष्पक्ष होकर निर्णय लें। उस भाव से और उस हद तक इसे एक पार्टी का विषय या एक आस्था का विषय नहीं माना जा सकता।
महोदय, सर्वप्रथम मैं आपकी अनुमति से विवाह और तलाक सम्बन्धी अध्याय को लेता हूँ। इस अध्याय पर विचार करते समय यह याद रखना जरूरी है कि भारतीय विधानमंडल के विभिन्न अधिनियमों द्वारा विवाह सम्बन्धी कानून में पहले ही काफी संशोधन किए जा चुके हैं। ऐसा एक अधिनियम हिंदू विवाह (निर्योग्ता निराकरण) अधिनियम, 1946 (1946 का अधिनियम 28) था, जिसके द्वारा यह कानून बनाया गया है कि कोई विवाह केवल इस तथ्य के आधार पर अमान्य नहीं हो जायेगा कि उसके पक्षकार उसी गोत्र या परिवार के हैं या विभिन्न जातियों अथवा उपजातियों के हैं। हाल ही में मद्रास विधानमंडल ने एक पत्नी विवाह प्रथा अनिवार्य कर दी है और कुछ प्रांतीय विधानमंडलों ने पहले ही तलाक के लिए प्रावधान कर दिये हैं। विवाह के लिए सहमति की आयु सम्बन्धी विधि के सम्बन्ध में भी परिवर्तन किया गया है। यदि हम इस दृष्टिकोण से विधेयक पर विचार करते हैं, तो विधेयक में किये गये परिवर्तन किसी प्रकार भी इतने क्रांतिकारी नहीं हैं, जितने वे, पहली दृष्टि में दिखाई देते हैं। जैसा कि प्रवर समिति के कुछ सदस्यों ने कहा है, मूल विधेयक के प्रावधानों में किये जा रहे पर्याप्त परिवर्तन दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यवस्थापन न्यायिक पृथक्करण, निर्वाह भत्ता, बच्चों की अभिरक्षा, न्यायालयों के क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया सम्बन्धी कुछ प्रावधान शामिल किये जाने के बारे में हैं।
जहां तक विधेयक के प्रावधानों का सम्बन्ध है, मैं एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ। सांस्कारिक विवाह और कानूनी विवाह में जो अन्तर किया जा रहा है वे वास्तविकता से अधिक स्पष्ट लगते हैं। इस सम्बन्ध में विधेयक के प्रावधानों का अनुसरण कठिन है, क्योंकि मुझे प्रतीत होता है कि तलाक के सम्बन्ध में, दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यावस्थापन के सम्बन्ध में दोनों के अन्तर्गत कानूनी विवाह के मामलों में और सांस्कारित विवाह के मामलों में एक से प्रावधान हैं। इस विधेयक के अनुसार ‘निषिद्ध अवस्थाओं,’ और