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मिला है। यह एक ऐसा पहलू है, जिस पर मैं जानता हूँ माननीय विधि मंत्री विज्ञान और इतिहास का एक छात्र होने के नाते निश्चित रूप से विचार करेंगे। यह लोगों की धार्मिक भावनाओं के प्रतिकूल है। वैज्ञानिक विचारों, धार्मिक मान्यताओं और लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उस नियम में ढील देने की कोई आवश्यकता नहीं है। निस्संदेह, यह समाज के कल्याण से मेल नहीं खाता। यदि भावी पीढि़यों के हित में, लोगों के कल्याण के हित में, लोगों के वंश की प्रगति के हित में आप नजदीकी रिश्तेदारों में विवाहों को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो ऐसा जरूर कीजिये। हमें कोई निर्भीक और स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। हमें इस मामले में एक निश्चित और ठोस रवैया अपनाना चाहिये। हमें मूलभूत सिद्धांतों के मामलों में कोई ढुलमुल रवैया नहीं अपनाना चाहिये। या तो प्राचीन सिद्धांत अपनायें या एक अधिक तार्किक और आधुनिक सिद्धांत। आप अपने विचारों के अनुसार अपनायें। किन्तु व्यक्तिगत रूप से मैं चाहता हूँ कि पुराने नियम को बनाये रखा जाये। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कुछ सम्प्रदायों के मामलों में उदाहरण के तौर पर भारत के कुछ भागों में कतिपय रीति-रिवाज प्रचलित रहे हैं, उनके मामलों में एक अन्य
खंड में आपने पहले ही प्रावधान कर दिया है। किन्तु सामान्य नियम सपिंडों में विवाह न करने का होना चाहिये। इस सम्बन्ध में हमारा कदम सही दिशा में नहीं है।
जहां तक तलाक के कानून का सम्बन्ध है, जैसा कि महाशय टेक चन्द ने अपने ज्ञापन में कहा है कानून में एकरूपता लाने के उद्देश्य से उन वर्गों और समुदायों के लोगों पर विशेष प्रतिबंध लगाने में जिन पर इस समय कोई प्रतिबंध नहीं है, कोई औचित्य नहीं है। मैं जानता हूँ कि दक्षिण भारत के कुछ भागों में गांव के मुखिया अथवा पंचायत की उपस्थिति में आपसी सहमति के आधार पर तलाक देने की परम्परा अभी भी प्रचलित है जैसे कि उत्तर भारत के दूसरे भागों में प्रचलित है। अन्ततः ऐसा प्रतीत होता है कि तलाक एक वर्ग के अनुसार विवाह कानून का मूलतत्व है। किन्तु क्या आपको विवाह से पूर्व तलाक की बात सोचनी चाहिये? यदि ऐसी धारणा है और यदि आप तलाक को बढ़ावा देना चाहते हैं या हर हालत में सरल तलाक के प्रावधान करना चाहते हैं, तो विधि न्यायालयों, तलाक न्यायालयों, तीन न्यायाधीशों वाले अपीलीय न्यायालय आदि का प्रावधान आप क्यों करते हैं, जब कि प्रभावित समुदायों के पास खाने तक के लिए पर्याप्त नहीं है? मैं समझता हूं कि यह कदम सही दिशा में नहीं है। जहां तक विशेष जातियों के समुदाय में रीति-रिवाजों के अनुसार तलाक की इजाजत का सम्बन्ध है, उसे जारी रखा जाना चाहिये, किन्तु एकरूपता के हित में आप तलाक को और महंगा न बनायें। इससे निश्चित रूप से मेरे पेशे को लाभ होगा और मैं इसका कोई विरोध नहीं करता। किन्तु मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर को बड़ी अच्छी तरह जानता हूँ और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह इस विशेष प्रश्न पर कोई निष्कर्ष निकालने से पूर्व प्रश्न के सभी पहलुओं पर विचार करेंगे।