(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 173

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहां तक न्यायिक पृथक्करण का सम्बन्ध है, मुझे कुछ वर्ष पूर्व हाउस ऑफ लॉर्ड (इंग्लैण्ड के उपरिसदन) में हुई बड़ी दिलचस्प बहस अच्छी तरह याद है। उस बहस में लार्ड बिरकेनहैड ने भाग लिया था। बहुत ही प्रसिद्ध वकीलों तथा कुछ बड़े न्यायविदों ने भी उस समय बहस में भाग लिया था। कुछ लोग ऐसे थे जिनका यह दृढ़ मत था कि न्यायिक पृथक्करण दूसरी पत्नीत्व को कानूनी रूप देने का दूसरा नाम है। मैं चाहूंगा कि इस न्यायिक पृथक्करण को जारी रखने के बजाय स्पष्ट तलाक का प्रावधान किया जाये। यदि यह भरण-पोषण का प्रश्न है, यदि यह सुनिश्चित करने का प्रश्न हो कि पत्नी को भूखा न रखने के दायित्व का निर्वहन किया जाये या पति तथा पत्नी बने रहते हुए आप अपने वैवाहित दायित्वों का निर्वहन नहीं करते तो इस सम्बन्ध में विधेयक में प्रावधान किया जाना चाहिये।

भरण-पोषण के सम्बन्ध में, न्यायिक पृथक्करण के सम्बन्ध में, तलाक के सम्बन्ध में और दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यवस्थापना के सम्बन्ध में अंग्रेजी कानून के जटिल प्रावधान यहाँ क्यों रखे जा रहे हैं? अतः विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इतने विस्तृत और जटिल प्रावधान करना आवश्यक है।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेय (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः देश की प्रगति के हित में ऐसे प्रावधान करना आवश्यक है।

श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्ययरः मैं इस सम्बन्ध में कोई राय नहीं दे रहा हूँ। आप इस सम्बन्ध में अपने निर्णीत विचारों का अनुसरण कर सकते हैं। किन्तु इस विषय में मेरा कोई निर्णीत मत नहीं है।

अतः मैं समझता हूँ कि हमें आधुनिक प्रावृतियों का ध्यान रखना होगा और इंग्लैण्ड में प्रचलित मात्र पुराने विचारों का अनुसरण नहीं करना होगा। इंग्लैण्ड में ही हाल के वर्षों में विवाह के कानून के सम्बन्ध में जनमत में काफी परिवर्तन आया है, यद्यपि इसके प्रत्येक पहलू ने इंग्लैण्ड की संविधि पुस्तिका में स्थान नहीं पाया है। अतः इंग्लैण्ड के कानूनों की केवल नकल करने के बजाय, हमें यह देखना होगा कि क्या हम कोई परिवर्तन कर सकते हैं।

जहां तक हमारे सामान्य सिद्धांत का सम्बन्ध है, मैं नहीं समझता कि तलाक या अन्य किसी मामले में यह विधेयक कठोर है। जो भी कठिनाइयाँ या जटिलतायें सामने आई हैं वे दो अलग-अलग विचारधाराओं में संगति स्थापित करने के ईमानदारी के प्रयास के कारण आई हैं। एक ओर यह प्राचीन विचारधारा है कि विवाह आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता, और दूसरी ओर यह आधुनिक विचारधारा है कि कतिपय परिस्थितियों में अलग होने का प्रावधान होना चाहिये। अब समस्या यह है कि इन दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाये। हमें इस समस्या पर ठंडे दिमाग से विचार करना चाहिये और एक-दूसरे को समझने का प्रयास करना चाहिये। हमारे विचार जो भी हों, हम