(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 174

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प्रवाह को नहीं रोक सकते। मेरा एक बहुत ही दकियानूसी और रूढि़वादी परिवार से संबंध हैं। मैं उन लोगों में से हूँ, जिनकी अभी भी श्रसद्धों में आस्था है। मैं अपने कौटुंबिक घर को काफी महत्व देता हूँ और कुछ हद तक जीवन के प्राचीन दृष्टिकोण में विश्वास रखता हूँ। लेकिन साथ ही मैं वर्तमान रुझान की अनदेखी नहीं कर सकता। मेरे बेटे मेरे जैसे नहीं हो सकते और मेरे पोते तो और भी भिन्न होंगे। इन परिस्थितियों में यदि मेरा जीवन भूत से जुड़ा हुआ है, मैं काफी हद तक आधुनिक रुझान को भी समझता हूँ। अतः इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हमें इस विधेयक पर विचार करना चाहिए। यदि आप वास्तव में सांस्कारिक विवाह में विश्वास रखते हैं, तो मुझे सांस्कारिक विवाह के सुगमता से अदालती विवाह में बदलने का यह तरीका किसी तरह पसन्द नहीं है। मेरा यह विचार है कि या तो सांस्कारिक विवाह होने चाहिये या बिल्कुल नहीं होने चाहिये। सांस्कारिक विवाह के मामले में तलाक के विशेष आधार होने चाहिये और अदालती विवाह के मामले में भी तलाक के विशेष आधार होने चाहिए। मैं दोनों को मिलाने के पक्ष में नहीं हूँ।

अब मैं दत्तक ग्रहण के अध्याय पर आता हूँ। दत्तक ग्रहण सम्बन्धी अध्याय पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता नहीं है, जबकि दत्तक ग्रहण विधि के मामले में न्यायिक निर्णय को ध्यान में रखा गया है। विधि में परिवर्तनों के आलोक में विभिन्न जातियों के व्यक्तियों में विवाह के मामले में विधि में आवश्यक परिवर्तन किये गये हैं। ऐसे विवाहों से हुई संतान को विरासत का अधिकार देने और विवाह विधि के आधार पर गोद लेने के लिए एक लड़के की पात्रता के प्राचीन नियमों को विशेष जातियों और विशेष परिस्थितियों में दत्तक ग्रहण की विधिमान्यता के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में बनाये रखने में कोई औचित्य नहीं है। तदनुसार विधेयक में वैध दत्तक ग्रहण देने और लेने का सरल नियम बनाया गया है। गोद लेने वाली मां और गोद लिये जाने वाले लड़के के बीच मुकदमेबाजी न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सम्पत्ति अधिकार विनियमित किये गये हैं। सम्पत्ति से वंचित करने को रोकने के लिए एक प्रावधान किया गया है, जिससे वैसी लम्बी मुकदमेबाजी को रोका जा सकेगा, जो भुवन मोई के मामले के बाद, गोद लेने सम्बन्धी विधि का एक विशेष अंग बन गई है। मयूख विधि के मुख्य सिद्धांतों के पश्चात् दत्तक ग्रहण की मान्यता के लिए एक शर्त के रूप में अपनाने के लिए किसी प्राधिकार की आवश्यकता के सम्बन्ध में विधि को सरल भी बनाया गया है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दत्तक ग्रहण सम्बन्धी अध्याय के प्रावधानों को देखते हुए सभा से इस पर विचार करने की सिफारिश की जा सकती है। दत्तक ग्रहण की वैधता के लिए पति के स्पष्ट प्राधिकार की आवश्यकता, पति द्वारा प्रदत्त प्राधिकार के क्षेत्र और निबन्धन की सीमा, दत्तक ग्रहण पर विवाद करने में सबसे अधिक रुचि रखने वाले निकटतम सपिंडों की अबाध सहमति और पति के प्राधिकार के लिए स्थानापन्न होने और वरिष्ठ तथा कनिष्ठ विधवा के परस्पर दावे, गोद लेने के लिए शक्ति के प्रयोग पर रखी जाने वाली सीमायें, अंग्रेजों के समय में भारत में न्यायालयों में मुकदमेबाजी