160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का लाभप्रद स्रोत रही हैं। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है कि इस विधेयक से दत्तक ग्रहण विधि और गोद में लिये गये बेटे के अधिकार की विधि काफी सरल हो गई है। कुल मिलाकर, मैं समझता हूँ कि विभिन्न समुदायों के बीच विवाह हो सकता है, यह दत्तकग्रहण अध्याय का एक अंग बन गया है, और लड़के के गोद लिये जाने की पात्रता सम्बन्धी सभी प्रतिबन्ध अनिवार्य रूप से समाप्त हो जाते हैं। जब गोत्र ही नहीं रहा तो गोद लेने के लिए सगोत्र कैसे एक शर्त हो सकती है? अतः सरलता और औचित्य के हित में हमें अनिवार्य रूप से यह देखना है कि दत्तक का लेन-देन ही काफी है_ और हमें इसी स्थिति से समझौता करना होगा। पहला कदम लेने के बाद आप दूसरा कदम लेने से नहीं रुक सकते। यहां विधानमंडल ने पहला कदम ले लिया है। अतः अगला कदम उठाने में आनाकानी करने का कोई लाभ नहीं है। इन परिस्थितियों में मैं सभा से दत्तकग्रहण अध्याय पर विचार करके अनुकूल निर्णय लेने की सिफारिश करता हूँ।
अब मैं विधेयक के अन्य भागों की ओर आता हूँ जिन के ऊपर चयन समिति के सदस्यों से मेरा मतभेद है। संयुक्त परिवार प्रथा पर विचार करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय कृषि की समस्यायें और इसका भविष्य, मुख्य व्यवसाय के रूप में व्यापार या धन्धा करने वाले समुदायों की अनेक व्यापार सुविधाओं की स्थिति का अनिवार्य रूप से काफी महत्व है। भारत में ग्रामीण जीवन की स्थिति से भिज्ञ कोई व्यक्ति यह जानता है कि विशेष परिवारों का विशेष भूमि पर पीढि़यों से कब्ज़ा रहा है। काश्तकार परिवारों को, जो काफी समय से भूमि जोतते रहे हैं, भोगाधिकार देने का मुख्य कारण यही है। इस सम्बन्ध में मैं यह कहना चाहता हूँ कि मेरे सम्मानीय मित्र श्री संथानम ने भारत में ग्रामीण जीवन के बारो में जो कुछ कहा है उसके सम्बन्ध में मेरा उनसे काफी मतभेद है। यह कहना सही नहीं है कि संयुक्त परिवार टूट रहा है। मैं भी यह कह सकता हूँ कि मैं भारत के ग्रामण जीवन से जुड़ा हुआ हूँ। मैं स्वयं एक ग्रामीण हूँ यद्यपि मैंने मद्रास शहर में करीब 40 वर्ष बिताये हैं। इन चालीस वर्षों में ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा जब मैंने कम से कम एक महीना किसी गांव में न बिताया हो। मैं बड़े दिनों तथा गर्मी की काफी छुट्टियां गांवों में तथा गांवों के लोगों के साथ बिताता हूँ। अतः मेरा दावा है कि मैं भारत में कम से कम मद्रास में ग्रामीण जीवन के बारे में कुछ जानता हूँ और उनके बारे में मुझे जो कुछ जानकारी है वह पुस्तकों या ग्रामीण पुस्तिकाओं के माध्यम से है। अतः मैं इस कथन से पूर्णतया असहमत हूँ कि जहाँ तक भारत के गांवों का सम्बन्ध है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। साथ ही मैं निश्चित रूप से अपने मित्र श्री संथानम की इस बात से सहमत हूँ कि जहां तक सगोत्र शाखाओं का सम्बन्ध है, पहली पीढ़ी के बाद संयुक्त परिवार में टूटने की प्रवृत्ति पाई जाती है। पहली पीढ़ी में विशेष रूप से पिता के जीवनकाल के दौरान संयुक्त परिवार नहीं टूटता है। यदि कोई परिवार टूटता है तो सामान्यतया तब टूटता है जब पिता के पुत्र मर जाते हैं और बच्चों के बच्चे बड़े हो जाते हैं। अतः आपको केवल सिद्धान्त के आधार