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पर आगे बढ़ने के बजाय, तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिये। अभी हाल तक मैं भी एक संयुक्त परिवार का सदस्य रहा हूँ और मैं अभी भी संयुक्त परिवार के जीवन के आदर्शों में विश्वास रखता हूँ। मैं निश्चित रूप से मानता हूँ कि जीवन के कुछ पहलुओं में उदाहरण के तौर पर शिक्षा के मामले में संयुक्त परिवार पद्धति से काफी लाभ हुआ है। कई गरीब भाइयों ने खुद भूखा रहकर अपने भाइयों को शिक्षा दिलाई_ कई चाचाओं ने भूखा रहकर अपने भतीजों को शिक्षा दिलाई। संयुक्त परिवार जीवन में एक तरह का सीमित समाजवाद विद्यमान रहा है। साथ ही मैं यह मानता हूँ कि कोई प्रथा अधिक देर नहीं चल सकती। किसी प्रथा को सामाजिक प्रगति के रास्ते में बाधक नहीं बनने देना चाहिये किन्तु प्रश्न यह है कि क्या इस पर विचार करने का समय आ गया है? मैं यह बात मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि गांवों में संयुक्त परिवार पद्धति टूट रही है और कोई सुधार करते समय हमें यह याद रखना चाहिये कि भारत गांवों का देश है। ग्रामीण लोग अभी भी काफी हद तक संयुक्त परिवार पद्धति का अनुसरण करते हैं। विधवाओं और पुत्र-वधुओं को अधिकार देकर संयुक्त परिवार पद्धति में हाल ही में किये गये हस्तक्षेपों में स्थिति में कोई विशेष अन्तर नहीं आया है। गैर कृषि सम्पत्ति के मामले में भी जिन समुदायों का मुख्य व्यवसाय व्यापार है, वे व्यापार या कारोबार एक पारिवारिक उद्यम या व्यापार के रूप में चला रहे हैं। देश के मेरे क्षेत्र में यही स्थिति है। पिछले चालीस वर्षों में नतुकोट्टई के चेट्टिठ्ठयरों से मेरे काफी सम्बन्ध रहे हैं। वे पिछले पांच या दस वर्षों से ही अलग कम्पनियां बनाने लगे हैं, लेकिन इस का उद्देश्य संयुक्त परिवारों को तोड़ना नहीं अपितु आयकर विनियमों से बचना है। अतः यह कहना सही नहीं है कि संयुक्त परिवार का जीवन वैश्यों या नतुकोट्टई चेट्टियरों या मारवाडि़यों में टूट रहा है। अब इस विधानसभा या संसद में बैठकर यह सोचना बेकार है कि हमें भारत के हर कोने के बारे में सभी तथ्यों की जानकारी है और यह सोचने का भी कोई फायदा नहीं है कि हम इस आधार पर विधान बना सकते हैं। हमें केवल इस बात पर विचार करना है कि क्या ऐसा आधुनिक स्थितियों के अनुकूल नहीं है और क्या इससे आगे प्रगति के रास्ते में बाधा आयेगी? आप को उन परिवर्तनों का भी ध्यान रखना होगा जो संयुक्त परिवार कानून में पहले ही किये जा चुके हैं। हाल के वर्षों में संयुक्त परिवार कानून को काफी ढीला किया गया है। अब यह स्थापित कानून है कि संयुक्त परिवार का कोई सदस्य किसी न्यायालय में हवाला किये बिना शेष परिवार से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है। संयुक्त परिवार के किसी स्दसय की ओर से इच्छा या इरादे की अभिव्यक्ति ही नाता तोड़ने के लिए काफी है, फिर भी अनेक लोग संयुक्त परिवारों के सदस्य बने हुए हैं क्योंकि वे अभी भी संयुक्त परिवार प्रथा को पसंद करते हैं। संयुक्त परिवार को कोई सदस्य पारिवारिक सम्पत्तियों में अपना हिस्सा दूसरे को दे सकता है। बाप और बेटे के मामले में पूरी सम्पत्ति बाप के ऋणों के लिए चुकाने के लिए खर्च की जा सकती है। बेटा बाप के ऋण के लिए उत्तरदायी है। वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि ऋण राशि बाप द्वारा अनैतिक प्रयोजनों के लिए खर्च की गई। मेरा पक्का विश्वास है कि इस