162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रकार की मुकदमेबाजी खत्म हो रही है। अब यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि बाप ने अनैतिक प्रयोजनों के लिए ऋण राशि खर्च की थी। स्वर्जित सम्पत्ति सम्बन्धी कानून को भी काफी सरल बनाया गया है। प्रिवी परिषद के निर्णयों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई व्यक्ति सम्पत्ति अर्जित करता है तो वह उसे खुद के लिए अपने पास रख सकता है। अतः मैं अपने मित्र माननीय विधि मंत्री से यह अनुरोध करता हूँ कि यह प्रथा अभी भी प्रचलित है। यह प्रथा अगले पंद्रह, तीस या पचास वर्षों में टूट सकती है। विवाह विधि में परिवर्तन तथा अन्य चीजों के कारण यह पद्धति टूट सकती है। किन्तु मेरा प्रश्न इतना ही है कि लोगों की इच्छा, उनकी सहमति, लोगों की सामान्य चेतना को ध्यान में रखे बिना ऐसा विधान क्यों बनाया जाये? आप सोच सकते हैं कि मैं एक ऐसा प्राचीन व्यक्ति हूँ जिसे इन चीजों की समझ नहीं है। मैं जरूर चाहता हूँ कि यह देश समय के अनुसार अग्रसर हो, लेकिन मेरा अनुरोध है कि पहले आपको लोगों की इच्छा जानने का प्रयास करना चाहिये। यह तर्क दिया जा सकता है फ्ठीक है, जहां तक कृषि सम्पत्ति का सम्बन्ध है, हम इसे नहीं छुएंगे, लेकिन हम गैर-कृषि सम्पत्ति के सम्बन्ध में एक परिवर्तन करेंगे।य् इस प्रकार के मामलों में एक प्रकार की सम्पत्ति और दूसरी भूमि या सम्पत्ति के बीज विभेद करना सरल नहीं है। एक बार आप गैर-कृषि सम्पत्ति सम्बन्धी कानून में परिवर्तन करते हैं तो आपको अनिवार्य रूप से कृषि सम्पत्ति सम्बन्धी कानून में भी परिवर्तन करना पड़ेगा। करों के प्रयोजनार्थ केन्द्र और राज्यों के बीच विधायी शक्ति के वितरण के मामले मे कृषि और गैर-कृषि सम्पत्ति में विभेद किया जाता है। यह केवल प्रयोग की बात ही है कि कतिपय शक्ति प्रांतों को दी गई है और कतिपय शक्ति केन्द्र को दी गई है और इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हिंदू उत्तराधिकार विधि एकल और सम्पूर्ण है। उत्तराधिकार विकृत कार्य नहीं है। उत्तराधिकार बांटा नहीं जा सकता। अतः जब आप इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो आपको कृषि सम्पत्ति के सम्बन्ध में तथा गैर-कृषि सम्पत्ति के सम्बन्ध में इन सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिये और आपको यह सोचना चाहिये कि क्या समाज के बृहतर हित में पारिवारिक पद्धति में क्रांतिकारी परिवर्तन करने का समय आ गया है। मैं अपने मित्र माननीय विधि मंत्री से इस प्रश्न पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ कि इस विधेयक में कुछ अध्याय स्थगित क्यों न कर दिये जायें।
महादेय, मैं इस प्रश्न के एक और पहलू को उठाना चाहता हूँ अर्थात् उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में बेटों और बेटियों के उत्तराधिकार। मुझे इस पर बोलने का विशेषाधिकार है क्योंकि मैं बेटियों और बेटों दोनों का पिता हूँ और मैं इसे दोहराता हूँ। वास्तव में बहुमत महिला के पक्ष में है, चार बेटियां और तीन लड़के। अतः मुझे इस विषय पर बोलने का विशेष अधिकार है। (सुनिये, सुनिये) एक वकील के नाते मैं जो थोड़ा-बहुत जानता हूँ उसके अलावा मुझे बेटियों और बेटों का पिता होने के नाते विशेष अधिकार भी हैं। अब मैं चाहता हूँ कि आप इस समस्या पर विचार करते समय हिंदू परिवार में सामान्य ढांचे पर