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विचार करें। आपका कहना है कि यदि तीन बेटे मिल कर रहना और साझी सम्पत्ति रखना कठिन महसूस करते हों, तो विभिन्न जातियों या समुदाय के लोगों से विवाहित बेटियों से आप गांवों में मिलाकर खेती करने की आशा कैसे कर सकते हैं? इन परिस्थितियों में क्या यह देश के बृहत्तर हित में है कि पिता और बेटे की यह सम्पत्ति बिना किसी मतभेद के बेटों और बेटियों में बराबर बांटी जाये? यदि यह न्याय का प्रश्न है, यदि यह समानता का प्रश्न है, यदि यह सैद्धान्तिक समानता का प्रश्न है तो मुझे इसके विरुद्ध कुछ नहीं कहना है, किन्तु कानूनन तर्कसंगत नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सदैव असंगत होता है, किन्तु इसे समाज के सामाजिक स्तर, समाज की चेतना, परिवारिक जीवन पर इसके प्रभाव और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। अतः स्थिति स्पष्ट नहीं है। हमें यह देखना होगा कि एक हिंदू परिवार में क्या होता है। संथानम दिल्ली से महाशय को देखते हैं। यदि एक भाई के घर में विवाह होता है तो वहां बहन और बेटी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसे बाप का घर समझा जाता है, बेटा पारिवारिक घर को उसके घर के रूप में देखता है। हम सभी जानते हैं कि बहन और बेटी का एक घर में कितना महत्वपूर्ण स्थान है। (जय हो, जय हो)। यदि मां और बाप आरती के लिए बैठते हैं तो बेटी या बहन इसे लाती है और आप उस अवसर पर बेटियों और बहनों को उपहार देते हैं। आखिरकार हम सभी हिंदू हैं_ आप यह नहीं भूल सकते। सर्वप्रथम जो व्यक्ति उपहार प्राप्त करता है वह घर में बहन या बेटी होती है। दूसरी बात यह है कि किसी हिंदू परिसर में तब तक कोई विवाह नहीं हो सकता जब तक कि बेटियों और बहनों को उपहार देने का प्रावधान नहीं किया जाता। पुनः इसके अतिरिक्त, यद्यपि ऐसे महिलायें जो बच्चे पैदा करना पसन्द नहीं करतीं यह स्वीकार न करें परिवार की बेटियां, निश्चित रूप से पहले गर्भधारण और दूसरे गर्भधारण जैसे हर अवसर पर संभाल ली जाती हैं। एक लड़की मायके जाती है और वह दो या तीन बच्चे होने के बाद ही बाप के या भाई के घर नहीं जाती और इस समय यही हिंदू जीवन शैली है। इन मामलों में हमें दिल्ली की जीवनशैली या कलकत्ता की जीवनशैली या मद्रास की जीवनशैली के आधार पर दिशा-निर्देश तय नहीं करने चाहिये। हमें प्रत्येक गांव में_ समूचे भारत में सामान्य जीवनशैली के आधार पर दिशा-निर्देश निर्धारित करने चाहिये। (जय हो, जय हो) अतः मैं इस सभा के माननीय सदस्यों से आदरपूर्वक अनुरोध करता हूँ, यद्यपि मैं उपाध्यक्ष को संबोधित कर रहा हूँ, कि वे इन चीजों को ध्यान में रखें। बाइबल में कुछ ऐसा कहा गया हैµ‘मैं बाप को बाप, बेटे को बेटे और भाई को भाई के विरुद्ध कर सकता हूँ’ अथवा कुछ ऐसा ही, किन्तु इस विधान के परिणामस्वरूप परिवार के सदस्यों में झगड़ा नहीं होना चाहिये, परिवार के सदस्यों में मध्य कोई अनावश्यक झगड़ा नहीं होना चाहिये। जहां तक सम्पत्ति का सम्बन्ध है, कुछ सीमा तक कलह, और कुछ सीमा तक झगड़ा अवश्यंभावी है।
शंकर ने कहा था कि हमारे देश में सम्पत्ति झगड़े की जड़ है और यह अवश्यंभावी है, लेकिन हमें वह कह कर इसे बढ़ावा नहीं देना चाहिये कि मैं भाई को भाई के विरुद्ध,