164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बहन को भाई के विरुद्ध, भाई को बहन के विरुद्ध कर दूंगा और इस प्रकार भारत के पारिवारिक जीवन को बदल दूँगा। ऐसा समय आ सकता है जब प्रत्येक बेटी व्यस्क होने पर अपने विवाह का इंतजाम कर सकेगी। बहुत-सी लड़कियां अपने विवाह के लिए अपने भाइयों पर आश्रित रहती है। ऐसा एक सप्ताह भी नहीं गुजरता, जब कोई भाई या बाप आकर एक विवाह के लिए कुछ सहायता न मांगता हो। यह कहा जा सकता है कि मैं दकियानूसी हूँ जो ऐसे अनुरोधों पर विचार करता हूँ किन्तु यह हिंदूजीवन पद्धति है। मेरे बारे में सोचा जा सकता है कि मैंने अंग्रेजी जीवन पद्धति में शिक्षा पाई है, किन्तु आप उन लोगों बारे में क्या सोचेंगे जो मेरी तरह शिक्षित नहीं हैं? आप अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं, मैं कम प्रगतिशील हो सकता हूँ किन्तु मैं फिर भी कहूँगा कि मैं भारत की मिट्टी में पैदा हुआ हूँ और मेरे विचार भारत की मिट्टी से जुड़े हुए है और इसलिए मैं अनुरोध करता हूँ कि इन महान मूल्यों को बचाये रखा जाये जो हमारे भारतीय जीवन का चित्रण करते हैं (जय हो, जय हो)। मैं आधुनिक रुझानों या प्रगति के आधुनिक विचारों का विरोध नहीं करना चाहता, किन्तु जहां राष्ट्रीय जीवन की धाराओं का वर्तमान सामाजिक धाराओं के साथ सम्पर्क बनाये रखना हमारा कर्त्तव्य है, हमें इस सोच से कोई लाभ नहीं होगा, कि हम समूचे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि शिक्षित महिलाओं में भी सभी की सोच एक-सी नहीं है और जो महिलायें विधानमंडलों में हैं उनकी सोच भी कुछ अन्य शिक्षित महिलाओं जैसी नहीं है और जो सम्माननीय घरानों की सदस्य है_ वे कुछ बातों में मतभेद रखती हैं।
श्रीमती रेणुका रे (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः क्या हमारे घराने सम्मानीय नहीं हैं?
श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यरः वे बहुत सम्मानीय हैं। मुझे खुशी है कि आपने हस्तक्षेप किया है। मैं अभ्यस्त हूँ और मैं आपको बता सकता हूँ कि वे काफी सम्मानीय हैं, यद्यपि वे कुछ दकियानूसी हो सकते हैं, जैसे कुछ लोग हैं जो बहुत सम्मानीय हैं और जिनके इन मामलों में विचार काफी प्रगतिशील हैं। मैंने अपने विचार प्रकट कर दिये हैं और मैं निश्चित रूप से यह नहीं मानता कि मैं एक सम्मानीय पुरुष नहीं हूँ_ मैं भी अन्य लोगों की तरह सम्मानीय हूँ। परन्तु मेरी जीवनपद्धति, मेरा सोचने का तरीका, इन मामलों में मेरा दृष्टिकोण उन समान रूप से आदरणीय, पुरुषों से अलग है क्योंकि मैं एक अलग ढांचे से ढला हूँ। उदाहरण के तौर पर मैं अपने प्रधानमंत्री का काफी आदर करता हूँ और कुछ मामलों में मैं उनकी बात मानता हूँ लेकिन साथ ही मैं इन चीजों को उन्हीं चश्मों से नहीं देखता जिनसे मेरे मित्र, मेरे आदरणीय मित्र देखते हैं, यदि मैं प्रधानमंत्री का अपना बहुत ही प्रिय मित्र पुकार सकता हूँ। यह केवल सोचने के तरीके की बात है।
माननीय श्री के. संथानम (परिवहन और रेल मंत्रालय के राज्य मंत्री)ः आपका वास्तविक प्रस्ताव क्या है?