4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से तो ऐसा कोई नहीं है। अतः मैं इस प्रश्न पर विचार नहीं करना चाहता जो आज हमारे सामने है, प्राचीन काल में क्या प्रचलित था, कि कैसे हमारे पूर्वज अपने खुद के कानून बनाकर समाज को अधिनियमित करते थे। मेरे सामने प्रश्न यह है कि हमें किन चीजों की जरूरत है, अपनी आवश्यकताओं, विधिक सकल्पनों और जरूरतों पर पूर्ण रूप से विचार करने के उपरांत आज के समय में क्या चाहिए। इस संहिता ने देश भर में बड़े पैमाने पर अप्रसन्नता, अशान्ति और कठोरता पैदा की है। कुछ महिलाएं यह घोषित करती हैं कि उन्हें पुरुषों के समान अधिकार चाहिये। अतः यह संहिता उनका पक्ष लेती है। पर कुछ व्यक्ति घोषित करते हैं कि महिलाओं के कोई अधिकार नहीं हैं। मैं अति विनम्र होकर इस सदन से यह निवेदन करता हूँ कि जब तक यह विधेयक इस सदन में विचाराधीन है तब तक हमें इसके विभिन्न नारेवाजियों अथवा इस तरह की चीजें जैसे आरोपों की ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहिये कि यह विधेयक महिलाओं के पक्ष में है अथवा पुरुषों के पक्ष में है। शान्तभाव से हमें यह विचार करना चाहिये कि क्या यह विधेयक पर्याप्त है अथवा पर्याप्त नहीं है। वह कौन आदमी है जो यह कह सके कि वह महिला से नहीं जन्मा है और वह कौन महिला है जो यह कह सके कि वह आदमी की बेटी नहीं है। इसलिए इस प्रकार के मामले में क्या हम अपनी बहनों, बेटियों और माताओं के साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार नहीं करेंगे? क्या हमारी माताएँ, बहनें और बेटियां यह मांग करेंगी कि वे अपने पतियों, भाईयों और बेटों के साथ उचित रूप से व्यवहार नहीं करेंगी? इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि इस मामले में कटु वाद-विवाद हों। मैं जानता हूँ कि यह अत्यन्त नाजुक समस्या है। अतः हमें उपयुक्त तरीके और शांतमन से इस पर विचार करना चाहिये।
इस बारे में अधिक विचार करने से पूर्व मैं इस प्रश्न के सम्बंध में कुछ बातें प्रस्तुत करना चाहता हूँ ताकि सदन के माननीय सदस्य और विशेष रूप से मेरी बहनें यह न सोचें कि मैं कुछ पूर्वाग्रह के साथ इस विधेयक का खण्डन करना हूँ अथवा इसका समर्थन करता हूँ। सर्वप्रथम मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं ऐसी विचारधारा से संबंध रखता हूँ जो यह विश्वास करता है कि जब तक महिलाओं को अचल और चल दोनों सम्पति में उचित अधिकार नहीं दिया जाता, तब तक उनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं होगा। मैं जोरदार शब्दों में महिलाओं के आर्थिक निर्भरता का खण्डन करता हूँ। मैं सीता जी के उस श्लोक को पसन्द नहीं करता जिसमें उन्होंने कहा हैः
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।
अमितस्यतु दातारं भर्तारन् का न पुजयेत।।
मैं रामायण का अत्याधिक आदर करता हूँ परन्तु मैं एक क्षण के लिए यह सिद्धान्त स्वीकार करने के लिए तैयार नही हूँ कि महिलाओं को सदैव आश्रित रखना चाहिए। मैं एक क्षण के लिए स्मृतियों में से कुछ का आदेश स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ