166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक न्यायालय से दूसरे में जा रहे हैं और हर प्रकार की गवाही देने दी जा रही है। यदि अनावश्यक मुकदमेबाजी से ही बचाया जा रहा है तो मैं चाहता हूँ कि विधवा को अपने जीवनकाल में अपनी सम्पत्ति का वितरण करने का निरापद अधिकार दिया जाये। लेकिन इसका अर्थ अनिवार्य रूप से यह नहीं है कि हर प्रकार की स्त्रीधन सम्पत्ति के मामले में हस्तान्तरण का तरीका एक-सा हो। आप इसे स्त्रीधन कह दें और फिर उत्तराधिकार के मामलों में कुछ अलग परिणाम निकालने लगें। एक बार आप इसे निरापद सम्पत्ति बना देते हैं, तो फिर इसे वारिसों को क्यों न दिया जाये? यही प्रश्न है। मैं 99 हिंदुओं से जिनसे मिलता हूँ यह पूछने का इच्छुक हूँ, फ्एक विधवा को उसके पति से कोई सम्पत्ति मिली है। यह सम्पत्ति निरापद है और उस विधवा की मृत्यु के बाद वह उसके पिता और माता को जानी है न कि उस व्यक्ति के बाप और मां को जिसकी सम्पत्ति उस विधवा को मिली है।य् मैं यह प्रश्न पूछता हूँ। आप देश के किसी भाग में जनमत संग्रह करवा सकते हैं और मुझे मालूम है कि उस जनमत संग्रह का क्या परिणाम होगा। और मैं किसी सदस्य को इस सभा में यह कहने के लिए चुनौती देता हूँ कि मैं जो अनुभव करता हूँ जनमतसंग्रह उससे भिन्न होगा। अतः एक वकील के नाते यदि आप मुझ से यह पूछते हैं कि क्या आप दो प्रकार की निरापद सम्पत्तियाँ, जिसमें से एक प्रकार का विस्तार एक प्रकार से हो और दूसरी का दूसरी प्रकार से, रख सकते हैं और मुझसे पूछते हैं कि एकरूपता के हित में एक प्रकार की सम्पत्ति और दूसरी प्रकार की सम्पत्ति के मामले में उत्तराधिकार का एक ही नियम क्यों न लागू किया जाये? तो मैं कहता हूँ कि आपको तर्कसंगति की वेदी पर सामाजिक भावनाओं का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। कानून सदैव तर्कसंगत हो, यह आवश्यक नहीं है। कानून का अनिवार्य रूप तर्कसंगत होना आवश्यक नहीं है। तर्क कानून का सार नहीं है।
माननीय श्री के. संथानमः क्या कानून सामान्यतया असंगत होना चाहिये?
श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यरः मेरे मित्र श्री संथानम के प्रश्न पर मेरा उत्तर यह है कि कानून अनिवार्यतः तर्कसंगत नहीं होना चाहिये। इसका कारण यह है कि कानून सामाजिक विकास और सामाजिक सामंजस्य की उपज है और इसलिए यह सदैव तर्कसंगत कैसे हो सकता है? समाज का विकास एक विशेश मापदण्ड अथवा योजना के अनुसार नही होता। दुर्भाग्यवश, समाज, एक साम्यवादी समाज को छोड़कर, किसी विशेष मार्ग पर अग्रसर नहीं होता। अतः इन परिस्थितियों में आप हिंदुओं की सामान्य भावनाओं का ध्यान रखें। यह कहना व्यर्थ है कि एक प्रकार के और दूसरी प्रकार के स्त्रीधन में भेद करना तर्कसंगत नहीं है। स्त्रीधन पति के रिश्तेदारों को पुनः क्यों जाने दिया जाये? यह पत्नी के वारिसों को क्यों न जाये? विधेयक में यही प्रावधान किया गया है। अतः जहां तक महिला की सम्पत्ति का सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर माननीय विधि मंत्री को इस विधेयक को कानून में परिवर्तन करने से पूर्व विचार