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करना चाहिये, ताकि ऐसा कानून बने जो लोगों की भावनाओं तथा सामान्य धारणाओं के अनुरूप हो। अभी हाल तक विधवा को वितरण का अधिकार नहीं था। प्रश्न यह है कि क्या वह सिद्धान्त कि उत्तराधिकार से प्राप्त सम्पत्ति का प्रत्येक व्यक्ति को वारिस बन जाना चाहिये और विरासत में मिली हर प्रकार की सम्पत्ति एक-सी समझी जानी चाहिये। महिलाओं की सम्पत्ति की सम्बन्ध में मेरा यही निवेदन है। इस पूरे विषय में मैंने तर्क का सहारा कभी नहीं लिया है।
अन्त में, महोदय यदि अनुमति हो तो मैं कुछ शब्द दूरवर्ती वारिसों के बारे में कहना चाहता हूँ। मैं महसूस करता हूँ कि इस समय जो प्रावधान किये गये हैं वे पूर्ववर्ती विधेयक की अपेक्षा काफी अच्छे हैं। प्रस्तुत विधान में दायभाग के कुछ सिद्धांतों का ध्यान रखा गया है और इसमें अन्य पद्धतियों का भी प्रावधान है। और मैं समझता हूँ, जहां तक दूरवर्ती वारिसों का सम्बन्ध है, प्रस्तुत विधेयक मूल विधेयक की अपेक्षा का काफी अच्छा है और इसमें आदि कोई छोटी-मोटी त्रुटि है, तो उसे आसानी से दूर किया जा सकता है।
संरक्षण, भरण-पोषण सम्बन्धी अध्याय और अन्य अध्यायों के पीछे उदार और प्रगतिशील भावना रही है और मेरा विचार है कि सभा को उनका हृदय से समर्थन करना चाहिये। यद्यपि छोटे-मोटे परिवर्तन की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता। किन्तु ऐसा परिवर्तन, विधेयक पारित करने के अन्तिम चरण में किया जा सकता है। अतः इस विश्वास के साथ कि माननीय विधि मंत्री तथा प्रधानमंत्री जनता द्वारा की गई आलोचना का ध्यान रखेंगे और समय की प्रगतिशील प्रवृत्तियों की भी अनदेखी नहीं करेंगे, मैं विधेयक के दूसरे पठन का प्रस्ताव करता हूँ और मैं माननीय डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ।
ऽडॉ. पी.के. सेन (बिहारः सामान्य)ः महोदय, मैं जानता हूँ कि मुझे अधिक समय नहीं लेना चाहिये क्योंकि सभा पर समय के संबंध में काफी दाबव है। साथ ही मेरे प्रिय मित्र श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर तथा अन्य लोगों द्वारा कुछ ऐसे पहलू उठाये गये हैं, जिन पर कुछ टिप्पणी करना आवश्यक है। उन्होंने विधेयक के प्रावधानों पर क्रमवार विचार करते हुए सबसे पहले विवाह कानून का मुद्दा लिया। मैं मानता हूँ कि मैं यह नहीं समझ सका कि उन्होंने इसका पक्ष लिया है या विरोध किया है। वास्तव में उन्होंने अपने भाषण के उस हिस्से में जिसमें उन्होंने यह मुद्दा उठाया है, यह कहा है कि इस विषय में उनकी कोई निश्चित राय नहीं है। जहां तक विवाह और तलाक विधि का सम्बन्ध है, मैं महसूस करता हूँ, कि हमें कोई निश्चित राय देनी चाहिये। विवाह कानून के मामले में तो निश्चित राय देना और भी जरूरी है क्योंकि इससे न केवल विवाह करने वाले पक्षकार ही प्रभावित होते हैंख्...,
ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 13 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 519-27