(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 184

169

अब मैं लोकमत के संबंधित अगले प्रश्न पर आता हूँ कि जनता का एक बड़ा हिस्सा होने के कारण, उन्हें इस विधेयक के प्रावधानों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। यह प्रश्न यहां बार-बार उठाया गया है कि जल्दबाजी क्यों की जाए और एक, दो या तीन वर्षों के लिए प्रतीक्षा क्यों न की जाये? हमने पहले ही काफी प्रतीक्षा कर ली है। हम एक और अवधि के लिए प्रतीक्षा क्यों न करें? प्रश्न यह नहीं है कि हिंदू संहिता ने 11 वर्ष ले लिये हैं। प्रश्न यह भी नहीं है कि इसे प्रस्तुत किये गये दो वर्ष हो गये हैं। वस्तुतः यह प्रस्ताव पिछली शताब्दी में रखा गया था।

मैं सभा को 1872 के अधिनियम III की याद दिलाता हूँ। विशेष विवाह अधिनियम सर्वप्रथम 1869 में सर हेनरी मै द्वारा केशव चन्द्र सेन, बंगाल के एक महान समाज सुधारक, के परामर्श पर विधानसभा के समक्ष रखा गया था। वास्तव में और पीछे जायें, तो पिछली शताब्दी के पांचवे दशक में विधवा पुनर्विवाह विधेयक विधानमंडल के समक्ष रखा गया था। महान् ईश्वर चन्द्र विद्यासागर हिंदू विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए उनके मत को काफी प्रभावित कर रहे थे। उसी समय विधानसभा में समक्ष चार सौ लोगों द्वारा हस्ताक्षरित एक विशेष याचिका लाई गई जिस में कहा गया कि यद्यपि हिंदू रूढि़वादी हैं, पर विवाह विशेष जाति तक सीमित रखने में उनका विश्वास नहीं है, वे अंतर्जातीय विवाह में विश्वास रखते हैं। वे एक पत्नी विवाह में विश्वास रखते हैं, और उनका विश्वास है कि शुद्ध हिंदू प्रथाओं का पालन करने के लिए कुछ अनुष्ठानों का पालन किया जाना अनिवार्य है। किन्तु वे अन्य अनुष्ठानों से बचना चाहते हैं और इसलिए वे चाहते हैं कि विधानमंडल एक व्यापक विधेयक पारित करे, न केवल हिंदू विधवा पुनर्विवाह विधेयक, अपितु ‘हिंदू विवाह विधेयक’, जिसमें अर्न्तजातीय विवाह का, वयस्क विवाह का और ऐसे अनुष्ठानों के साथ विवाह का प्रावधान किया जाये, जिन पर उनको कोई आपत्ति न हो, न कि ऐसा हर अनुष्ठान जो उस समय अनिवार्य समझा जाता था। यह कोई 1856 की बात है और वह एक अत्यन्त प्रतिनिधि संस्था थी, जिसने ऐसी याचिका दी थी। याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यक्तियों में पीरी चन्द्र मित्तर, राधानाथ सिकदार, अभय चरण मलिक और रसिक कृष्ण मलिक जैसे लोग थे। उनका ब्रह्म समाज से कोई सम्बन्ध नहीं था_ वे रूढि़वादी हिंदू थे। इस संगठन के साथ-साथ ब्रह्म समाज की सभी गतिविधियां भी चल रही थीं। ब्रह्म समाज के अनुयायी पहले ही अन्तर्जातीय विवाह करते थे क्योंकि उनका विश्वास था कि सत्य, सत्य है और सत्य का अनुसरण करते समय परिणाम का ध्यान नहीं रखा जाता। वे इस बात की परवाह नहीं करते थे कि कानून क्या है। उनका कहना था कि वे इस तथ्य के बावजूद जाति को तोड़ देंगे कि कानूनी वैधता के सम्बन्ध में कठिनाइयां हो सकती हैं। बाद में उन्होंने सोचा कि भावी पीढि़यों के हित में, बच्चों के हित में यह स्थिति खराब हो सकती है और यही कारण था कि सर हेनरी मैने ने एक विधेयक पेश किया जो अन्ततः विशेष विवाह अधिनियम, 1872 के रूप में सामने