(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 185

170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आया। इस अधिनियम से न केवल ब्रह्म समाज की, अपितु अन्य लोगों की आवश्यकतायें भी पूरी हुई हैं। यह बात इस तथ्य से सिद्ध हो जाती हैं कि इस अधिनियम के पारित होने के बाद इसे अन्य वर्गों पर लागू करने तथा अधिनियम के विशेष खंडों के प्रति कुछ आपत्तियों को दूर करने के लिए इसमें कई संशोधन किये गये हैं। ऐसा करते समय उन लोगों ने समय-समय पर समाज की अन्तरात्मा के प्रतिनिधि या अल्पसंख्यक अन्तरात्मा के प्रतिनिधि के रूप में काम किया। चूँकि अल्पसंख्यकों की अन्तरात्मा होती है, और अल्पसंख्यकों की सामाजिक अन्तरात्मा का भी आदर किया जाना चाहिये। हर देश में हम पाते हैं कि अल्पसंख्यकों की अन्तर्रात्मा ही अपने दृष्टिकोण को सही सिद्ध करने के लिए कानून की सहायक बनी है। महोदय, जो भी है, आज हम यह नहीं जानते कि कौन-सा वर्ग अल्पसंख्यक है और कौन-सा बहुसंख्यक है। किन्तु यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक लोकतांत्रिक सरकार में सभी वर्गों के लोगों को अनिवार्य रूप से अपनी अन्तरात्माओं को सही सिद्ध करना चाहिये, अपनी जीवनपद्धति तथा विचारधारा को सही सिद्ध करना चाहिये और कम से कम जहां तक मूलभूत मुद्दों का सम्बन्ध है, उनका आदर किया जाना चाहिये। इस दृष्टि से हमें वास्तव में जिस प्रश्न का समाधान करना है, वह यह हैः क्या यह विधेयक किसी विशेष दृष्टि से किसी विशेष वर्ग की अन्तरात्मा पर लागू होता है? ( बाबू राम नारायण सिंहः हाँ।) और क्या इसी से इसकी उत्कृष्टता अथवा अन्य स्थिति का परीक्षण होगा?

अब हम विधेयक के पहले भाग की ओर आयें तो जहां तक विवाह, तलाक, न्यायिक पृथक्करण, संरक्षण, भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा आदि का सम्बन्ध है, जहां तक मैं समझ सकता हूँ, यह तर्क संभवतया नहीं दिया जा सता कि इसे किसी पर थोपा जा रहा है। अन्ततः इस प्रावधान का उपयोग केवल उन मामलों में किया जायेगा, जिनमें आपको लगेगा कि तलाक नितान्त अपरिहार्य हो गया है। और ऐसे मामले होते ही हैं, इसके बारे में कोई प्रश्न नहीं उठता। ऐसे मामले भी होते हैं, जिन में विवाह सम्बन्ध बना रहे, तो दोनों पक्षकारों का जीवन दूभर हो सकता है और परिवार टूट सकता है। और केवल ऐसे मामलों में ही तलाक की नौबत आ सकती है।

सारजेन्ट रोहिनी कुमार चौधरी (असमः सामान्य)ः मैं पूछ सकता हूँ कि क्या इसके बाद के विवाह मंगलमय होंगे? वे बदतर हो सकते हैं?

श्री एल. कृष्णस्वामी भारती (मद्रासः सामान्य)ः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कैसी महिला से विवाह करते हैं।

डॉ. पी.के. सेनः मैं इस प्रश्न में नहीं जा रहा, क्योंकि उस स्थिति में यह आंकड़ों का मामला बन जायेगा कि कितने लोग वास्तव में सुखी हैं या कितने लोग वास्तव में दुःखी हैं। यह कसौटी नहीं है। कसौटी तो अपरिहार्यता है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो