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आर्थिक और सामाजिक अस्तित्व से है। इन परिस्थितियों में मैं आप से अनुरोध करता हूँ कि मानवीय अध्यक्ष द्वारा दिये गये आश्वासन का निर्वाहन करें।
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः वह अध्यक्ष है। वह निर्णय ले सकते हैं।
माननीय उपाध्यक्षः यह दुर्भाग्य की बात है कि अध्यक्ष महोदय अपनी पीठ पर विराजमान नहीं हैं। मैं चर्चा को दबाना नहीं चाहता किन्तु मैं एक समय-सीमा का सुझाव दे रहा हूँ ताकि उन सभी सदस्यों को, जो चर्चा में भाग लेना चाहते हैं अवसर मिल सके। मैं इसे माननीय सदस्यों के विवेक पर छोड़ता हूँ। पंद्रह मिनट की सीमा अलंघनीय नहीं है। एक मिनट अधिक या एक मिनट कम हो तो कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन मुझे डर है कि इस से अधिक की अनुमति नहीं दी जा सकतीµचाहे सरकार चर्चा एक दिन के लिए बढ़ाने के लिए तैयार हो भी जाये। मैं नहीं जानता कि सरकार समय बढ़ाने के लिए तैयार है अथवा नहीं, क्योंकि बोलने वाले सदस्यों की संख्या काफी है और प्रत्येक सदस्य चाहेगा कि उसे अवसर दिया जाये।
पंडित बालकृष्ण शर्मा (यू.पी.ः सामान्य)ः यदि ऐसा है तो हम अगले सत्र में विचार कर सकते हैं।
माननीय उपाध्यक्षः यह मेरे अधिकार की बात नहीं है।
श्री एस. नागप्पा (मद्रासः सामान्य)ः हम एक या दो घंटे अधिक के लिए क्यों नहीं बैठ सकते?
माननीय उपाध्यक्षः फिलहाल जो सदस्य पन्द्रह मिनटों में अपना भाषण पूरा कर सकते हैं, वे बोल सकते हैं। किन्तु वे सदस्य, जो समझते हैं कि उन्हें अधिक समय मिलना चाहिये, वे अधिक समय ले सकते हैं।
श्री एम. मिरुमला रावः आप भाषण की खूबियों पर ध्यान दे सकते हैं और यदि कोई तर्क बार-बार दोहराये जाते हैं, तो आप बोलने वाले सदस्य को अपने तर्कों की पुनरावृति न करने के लिए कह सकते हैं।
माननीय उपाध्यक्षः बहुत अच्छा, अब डॉ. सेन।
श्री एच.के. खाण्डेकर (सी.पी. एवं बेरारः सामान्य)ः केवल ढाई घंटे और हैं। यदि प्रत्येक पन्द्रह मिनट के लिए बोले, तो कुल दस सदस्य बोल सकते हैं। अन्य सदस्यों का क्या होगा जो इस विधेयक पर बोलना चाहते हैं? मेरा आप से अनुरोध है कि आप चर्चा एक या दो दिन बढ़ाने के लिए सरकार से कहें। यह इतना महत्वपूर्ण विधेयक है कि पूरे राष्ट्र की आंखें इस पर टिकी हुई हैं। हमें इस पर पूरी चर्चा करनी चाहिये और तभी जिस रूप में भी सहमति बने इसे पारित करना चाहिये।