174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय उपाध्यक्षः मुझे विश्वास है कि सभा को कार्यवाही और माननीय सदस्यों द्वारा दिये गये सुझाव सरकार को भेजे जायेंगे और सरकार उन पर विचार करेगी। डॉ. सेन अपना भाषण जारी रख सकते हैं।
डॉ. पी.के. सेनः महोदय, मैं महसूस करता हूँ कि भाषण छोटा होना ही बेहतर है किन्तु कई बार सक्षिप्तता से अविवेक की झलक आती है। मैं संक्षेप में बोलने से स्थिति बिल्कुल स्पष्ट नहीं कर पाऊंगा और मेरी बात अधूरी और अस्पष्ट होगी तो किसी को भी कोई लाभ नहीं होगा। अतः मैं मोटे तौर पर मूलभूत मुद्दे ही उठाऊंगा और उनके ब्यौरों में नहीं जाऊंगा।
पिछली बार मैं सभा में जिस प्रश्न को सम्बोधित कर रहा था कि क्या देश में तलाक की अनुमति देने से अन्य देशों की भांति इस देश में भी तलाक अधिक नहीं होने लगेंगे। इस प्रश्न का मेरा उत्तर यह था और है कि तलाक के मामले किसी देश के नैतिक मूल्यों की गुणवत्ता पर निर्भर करेंगे। एक समाज की रचना ऐसी हो सकती है कि केवल अपरिहार्य और आवश्यक मामलों में संबधित पक्ष तलाक की मांग करेंगे और एक अंतर्निहित घृणा होगी, अस्वाद होगा, लोग तलाक से घृणा करेंगे यदि तलाक के लिए कोई अवसर नहीं है और यह सिद्ध करने के लिए मनगढ़ंत सबूत जुटाया जाता है कि तलाक के कारण हैं। इस देश में यह प्रयोग बड़ौदा में और दक्षिण भारत के कुछ भागों में किया गया है, जहां तलाक काफी पहले से होते रहे हैं और आज भी होते हैं। किन्तु मुझे बताया गया है कि अभी तक बड़ौदा में ऐसे तीन मामले हुए हैं और ये तीन मामले पिछले 20 वर्षों में हुए हैं। मैं दोहराना चाहता हूँ कि समाज विशेष में व्याप्त सामाजिक वातावरण और नैतिक मूल्य ही तलाक के मामलों की संख्या निर्धारित करते हैं। अतः यह कोई कानून नहीं है, जो समाज को बनाता है। कानून केवल कुछ मामलों में तलाक की मंजूरी देता है जिनमें ऐसा करना आवश्यक होता है। विधेयक के इस भाग की, जो विवाह कानून के बारे में है, चार विशेषताएं हैं। पहली विशेषता यह है कि अन्तर्जातीय विवाह की स्वीकृति दी गई है। दूसरी विशेषता यह है कि तलाक के लिए प्रावधान है। तीसरे एक पत्नी विवाह का प्रावधान है। ये सभी प्रावधान 1872 के अधिनियम III मैं मौजूद हैं और इसलिए ऐसा नहीं है कि ये मुद्दे पहली बार हिंदू संहिता में उठाये गये हैं। जैसा कि मैंने कहा है, पिछली शताब्दी के पांचवे दशक में आन्दोलन खड़ा हुआ था और वह तब से चल रहा है। निस्संदेह जाति के विरुद्ध संघर्ष सर्वप्रथम ब्रह्म समाज ने केशव चन्द्र सेन के नेतृत्व में छेड़ा था। उस समय ब्रह्म समाज के अनुयायियों पर अत्याचार किये गये। उनका समाज से बहिष्कार किया गया और उनके साथ घृणित व्यवहार किया गया। आज हम मानते हैं कि जाति प्रथा समाप्त हो जायेगी और इसलिए अन्तर्जातीय विवाह के सम्बन्ध में इस विधेयक में जो प्रावधान किये गये हैं उनका किसी को विरोध नहीं करना चाहिये। इस में कोई संदेह नहीं है कि एक बहुत बड़ा लोकमत जातिप्रथा