(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 190

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को समाप्त करने के पक्ष में है। अन्यथा संविधान में इस प्रकार के सभी प्रावधान करने का क्या प्रयोजन है? जातिप्रथा समाप्त हो जायेगी। यदि हम यह रूख अपनाते हैं तो अन्तर्जातीय विवाह सम्बन्धी प्रावधानों में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।

यही बात एक पत्नी विवाह प्रथा पर लागू होती है। मैं नहीं समझता कि अभी भी कोई लोकमत द्वि पत्नी विवाह के पक्ष में है या बहुविवाह के पक्ष में हैं। ऐसे एकाध मामले हो सकते हैं लेकिन वह दूसरी बात है। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि पूरा लोकमत प्रथा के पक्ष में हैं। अतः जहां तक इसका सम्बन्ध है, प्रस्तुत विधेयक में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है और जैसा कि मैंने कहा है, तलाक की इजाजत से संभवतया कोई कठिनाई पैदा नहीं हो सकती क्योंकि अन्ततः उन आभागे लोगों के लिए अनिवार्य रूप से अनुज्ञात्मक प्रावधान होना चाहिये जिनके मामलों में तलाक आवश्यक है।

महोदय, इस मुद्दे पर आते हुए कि कोई परिवर्तन क्यों किया जाये (मैं इसी मुद्दे पर था) यह कहा गया है कि शास्त्रीय कानून का सख्ती से पालन होना चाहिये और उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। यह चर्चा इस सभा में घंटों तक चली है। यह कहा गया है कि शास्त्रीय विधि अन्तिम, अखण्ड और अलंघनीय है। आप इसे बदल नहीं सकते। मैं जानना चाहता हूँ कि शास्त्रीय विधि का क्या अर्थ है।

वास्तव में हमारे शास्त्रों में परिवर्तन के लिए सदा प्रावधान रहा है और उनमें परिवर्तन सदैव हुआ है। अन्यथा इन अनेक स्मृतियों का क्या अर्थ है। मनु में यह सुप्रसिद्ध समादेश है कि आचरण के चार आधार, चार मापदण्ड निर्धारित किये गये हैंः

श्रतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मन।

एतश्चतुर्विध प्राहः सक्षाद्धमस्य लक्षण।।

जिसका अनुवाद करने पर अर्थ निकलता है श्रुति, स्मृति, धर्मपरायण व्यक्तियों द्वारा स्थापित प्रथायें और अपनी निजी अन्तरात्मा की संतुष्टि, यही आचरण के चार मानदण्ड या मापदण्ड प्रस्तुत करते हैं। आचरण के इन चार मापदण्डों में आत्मा की आत्म-संतुष्टि, यारनी अन्तरात्मा, जिसका अर्थ, मैं समझता हूँ मात्र व्यक्तिगत अन्तरात्मा न होकर, सामाजिक अन्तरात्मा भी है। हम जिस युग में रहते हैं उसकी सामाजिक अन्तरात्मा का भी सम्मान करना होगा ओर यह एक मानक है जिसके आधार पर हमकें अपने आचरण और धर्म को जानना होगा। यह ऐसा मापदण्ड है जिसके आधार पर कानून बनाया जाना चाहिये और इसी सिद्धांत के आधार पर ही विधि, तथाकथित शास्त्रीय विधि में परिवर्तन, और परिवर्तन होता रहा है। मेरे माननीय मित्र विधि मंत्री ने अपने प्रारम्भिक भाषण में कहा कि आप पाराशर स्मृति या नारद स्मृति का अवलोकन करें तो आपको पता चलेगा कि उसमें विधवा पुनर्विवाह और कई ऐसी चीजों का प्रावधान है जिन्हें क्रांतिकारी कहा जा सकता है। वे वहाँ तक कैसे पहुंचे? उन्होंने बाधाओं को कैसे तोड़ा और ऐसा काम कैसे