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कि जब तक महिला का विवाह न हो जाये, उसे अपने पिता के नियन्त्रण में रहना चाहिये और विवाह के बाद पति के नियन्त्रण में और यदि वह विधवा हो जाती है तो अपने पुत्र के नियन्त्रण में होना चाहिये। मैं स्मृतियों के इस आदेश का विरोध करता हूँ इस कारण नहीं कि ये आदेश महिलाओं के लिए दुखःदायी हैं। मैं जानता हूँ कि जब तक भारत में महिलाओं का व्यक्तित्व सशक्त नहीं होता, तब तक महिलायें अपनी आर्थिक दशा में सुधार नहीं कर पायेंगी और जब तक उनका चहुँमुखी विकास नहीं होता, हमारी वंशावली में सुधार नहीं होगा। पुरुषों के समान महिलाओं को भी अपने विकास के लिए सभी प्रकार के अवसर दिये जाने चाहिये। मैं सोचता हूँ कि यह बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है कि इस प्रश्न को संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा जाए। हमें इस प्रश्न पर अधिक बुद्धिमत्ता से विचार करना है समग्र राष्ट्र तथा देश के कल्याण और उन्नति को ध्यान में रखते हुए।
हजारों वर्षों से हम कुछ प्रचलित रिवाजों और अनुष्ठानों के बारे में विश्वास करते रहे हैं और हम उन्हें सुरक्षित भी रखे हुए हैं। परन्तु इसके साथ ही हमें अपने कार्य की रूपरेखा का भी निर्धारण करना है कि हमें उन मुद्दों के सम्बंध में किस प्रकार कार्यरत होना है जो आज विश्व में उठाये जा रहे हैं जैसे ‘महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिये’। हमें इस सिद्धांत को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करना चाहिये, परन्तु हम कम से कम इस बात के लिए वचनबद्ध हैं कि पुरुषों के समान उन्हें विकास के लिए अवसर और सुविधायें प्राप्त हों। हमें इस सिद्धांत को ध्यान में रखना होगा। अतः बिना किसी आपत्ति के मैं यह निवेदन करता हूँ कि महिलाओं को चल और अचल सम्पतियों में उनके कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। मैं बलपूर्वक इसका समर्थन करता हूँ और मैं डॉ. अम्बेडकर को बधाई देता हूँ, उनके इस विधेयक में विवाह तथा गोद लेने के मामलों में जाति उन्मूलन के सिद्धांत को अस्वीकार करने। मेरे पास यह बताने के लिए शब्द नहीं हैं कि मैं आपको यह बता सकूं कि मैं इस प्रश्न को कितना अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। मैं इस प्रश्न को राष्ट्र निर्माण के प्रकाश में देखता हूँ। यह प्रश्न हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है, यह प्रश्न हमारे आधारभूत सिद्धांतों से संबंधित है। यदि किसी बात ने भारत का विनाश किया है उसकी प्रगति में बाधा डाली है तथा पाकिस्तान बनाने का कारण बनी है, तो वह जाति-प्रथा है। यदि कोई बात हमारे समाज में प्रवेश कर गई और उसकी शक्ति को खा रही है। जिसने ब्राह्मण को दूसरों का शत्रु बना दिया है, जाट को इतर जाट का शत्रु बना दिया है और को अन्य समुदायों का शत्रु बना दिया है। यह केवल जातिवाद है। मैं यह नहीं जानता कि हम किस प्रकार एक वर्गहीन समाज के निर्माण के मार्ग का अनुसरण, अस्वीकार कर सकते हैं जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस देश को दिखाया है। दो बातें, जो इस देश के लोगों को एकता में पिरोने के सूत्र हैं, वे रोटी-बेटी के सम्बंध को अपनाने में हैं। जहां तक अन्तर्जातिय विवाहों का सम्बंध है और जब तक इस प्रश्न का समाधान नहीं हो पाता, तब तक भारत में राष्ट्र-निर्माण की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए जहां तक इस प्रश्न का सम्बंध है, मैं सशक्त रूप से इसके पक्ष में हूँ।