(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 191

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया, जिसे हम क्रांतिकारी कहते हैं? इसका कारण यह था कि उच्चतम समादेशों के अनुसार, श्रुति और स्मृति ही आधार नहीं रहे हैं अपितु, अन्य आधार भी रहे हैं। आपको धर्मपरायण और धर्मनिष्ट व्यक्तियों के आचरण का अनुकरण करना होगा और ऐसे पुरुषों का अनुकरण करना होगा जो ऐसी जीवनपद्धति की जानकारी रखते हैं जो आत्मानुभूति की ओर ले जाती है। और आचरण के सिद्धान्त भी इन्हीं लोगों ने निर्धारित किये हैं। आपको इन पर अमल करना होगा। ये शास्त्रीय नहीं हैं, क्योंकि इन्हें अनिवार्य रूप से किसी श्रुति या स्मृति से नहीं जोड़ा जा सकता। किन्तु ये ही सही जीवनयापन के तरीके हैं जो निश्चित रूप से हमारे व्यक्तिगत तथा सामाजिक आचरण को विनियमित करने के लिए निर्धारित किये गये हैं। यदि ऐसा है, यदि विधि का विकास इस प्रकार होता है तो अनिवार्य रूप से हमें यह दिखाई देता है कि लोकमत जोरदार है, समाज या समाज के एक विशेष वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग की अन्तरात्मा यह कहती है कि विधि द्वारा एक विशेष जीवनयापन पद्धति की स्वीकृति दी जानी चाहिये। और जैसी अपेक्षा की जाती है वैसा ही प्रावधान करती है। यदि हमारा यह मापदण्ड हो तो इस समय हम संभवतया कह सकते हैं कि कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। लेकिन क्या हम यह कह सकते हैं कि हमारा कानून, हमारा शास्त्रीय कानून स्थिर रहा है? यदि यह अनुल्लंघनीय और अखंड हैं, यदि यह अपरिवर्तनीय और अटल है तो कोई प्रगति नहीं होगी और यह कहना हमारे विधि निर्माताओं के प्रति प्रतिकूल टिप्पणी होगी कि कानून में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। इसके प्रतिकूल अब दृढ़ता से यह कहने का अवसर है कि किसी विशेष वर्ग के विचारों को, चाहे वे अल्प- संरण्यक हों या बहुसंख्यक, दबाया नहीं जाना चाहिए। यदि किसी विशेष मुद्दे के सम्बन्ध में जोरदार मत हो, तो विधि को उसकी अनुमति देनी चाहिये।

महोदय, अब मैं अन्य मूलभूत मुद्दों की ओर आता हूँ। इस विधेयक के सम्बन्ध में कौन-सी अन्य मुख्य आपत्तियों उठाई गई हैं? वे सम्पत्ति पर मिताक्षर और दायभाग के बारे में है। हमें अपने आप से पूछना चाहिये कि क्या इस समय यह प्रश्न उठाना संगत है? संयुक्त परिवार प्रथा की अपनी खूबियां थी_ भूतकाल में इसकी अपनी महिमा थी, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। लेकिन मेरी यह धारणा कि हाल में संयुक्त परिवार प्रथा ही बड़ी संख्या में लोगों के लिए घिनौनी सिद्ध हुई है। वे महसूस करते हैं कि परिवार के आलसी लोग ही परिवार के कमाने वाले लोगों को चूसते हैं। ऐसे लोग भी हैं, जो कमाने का नाम तक नहीं लेना चाहते, क्योंकि उनके पीछे परिवार होता है और वे सोचते हैं, फ्जब हमारा भरण-पोषण करने के लिए परिवार है तो हम कमाई के लिए कोई कष्ट क्यों उठायें?य् और परिवार के वे लोग जो अपने खून-पसीने से कुछ कमाते हैं, उनकी कमाई उन अन्य लोगों द्वारा झड़प ली जाती है जो आलसी होते हैं और हर तरीके से फिजूलखर्ची करते हैं।