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डॉ. पी. देशमुख (सी.पी. एवं बरारः सामान्य)ः महोदय, क्या उन्होंने कभी शिकायत की है?
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः हां, वे करते हैं। ऐसी स्थिति में शिकायतें होना स्वाभावित हैं।
डॉ. पी.के. सेनः यदि उनकी शिकायत की सुनवाई हो तो निस्संदेह यह एक अलग बात होगी किन्तु परिवार में सभी कमाने वाले लोग होंगे तो शिकायत करने का कभी कोई अवसर नहीं आयेगा। अब वे कवेल एक तरीके से शिकायत कर सकते हैं अर्थात् पृथक होने के इरादे की अभिव्यक्ति द्वारा। इस समय वास्तव में क्या स्थिति हैं? पारिवारिक एकता कितनी ही मजबूत क्यों न हो, कोई व्यक्ति आकर यह कह सकता है कि मैं अलग होना चाहता हूँ और इरादे की इस अभिव्यक्ति से कानून की नजरों में वह फौरन अलग हो जायेगा। तब परिवार के आखण्डता कहां रहेगी? तब मिताक्षर परिवार क्या करेगा? इस समय न्यायिक नियमों के अनुसार स्थिति यह है कि पृथक होने के जरा से इरादे और उस इरादे की अभिव्यक्ति से प्रस्तावित पृथक्करण हो जायेगा। ऐसी स्थिति में मेरा अनुरोध यह है कि अब यह नहीं कहा जा सकता कि संयुक्त परिवार एक बड़ी संख्या में हैं, जो ज्यों की त्यों बने हुए हैं। यह प्रथा भरभरा कर गिर रही है और इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी के प्रयास से इसे अब संभवतया बचाया नहीं जा सकता। लोग अब व्यक्तिगत आजादी चाहते हैं। हर व्यक्ति जो कमाता है या कामना चाहता है, वह अपने तरीके से जीवनयापन करना चाहता है। वह नहीं चाहता कि परिवार के अन्य सदस्य उसके काम में कोई दखल दें। अब व्यक्तिगत स्वतंत्रता उनका लक्ष्य और उद्देश्य है। यह मांग आदिकाल से की जाती रही है। फ्व्यक्ति का ”ास होता जा रहा है और राज्य का विकास होता जा रहा है।य् पिछले कुछ समय से यह शिकायत सुनाई दे रही है और आज भी हम महसूस करते हैं कि हमारे समाज में बहुमत का नियम, समाज का नियम लागू होता है, किन्तु कोई नहीं चाहता कि ये नियम आगे भी लागू हों। अब व्यक्ति परिवर्तन चाहता है। उसका कहना है कि ‘‘मैं नहीं चाहता कि परिवार के नियम मुझ पर लागू हों। मैं आजादी चाहता हूँ और मैं अपने तरीके से जीवनयापन करना चाहता हूँ। मैं इस सभा के हर सदस्य से अनुरोध करता हूँ कि वह अपनी अन्तरात्मा से पूछे कि क्या आधुनिक समय की यही भावना नहीं है और यदि यही भावना है तो हम कहां है? ऐसा भवन खड़ा करने का प्रयास करने का क्या लाभ है, जो आगे बनाये रखना अब कठिन है। अतः मिताक्षर और दयाभाग के बीच जो एक बड़ा अन्तर किया जा रहा है, वह वास्तव में दूर चला गया है। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि जब हम सौंदर्य और सद्भावनाओं से तथा पूरी सूझबूझ के साथ विचार करेंगे, तो हम इन मतभेदों को दूर कर सकेंगे और हम किसी विशेष वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाये बिना कोई संतोषजनक समाधान ढूंढ सकेंगे। और मुझे पूरी आशा है कि ऐसा होगा। मैं ब्यौरे में नही जाना चाहता, किन्तु मैं बताना चाहता हूँ कि हमें आगे इस दिशा मे आगे अपनी चर्चा को बढ़ाना चाहिये।