(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 193

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

महोदय, अब मैं एक अन्य ब्यौरे को लेता हूँ। वास्तव में विरासत अथवा उत्तराधिकार के मामले में किसी बात पर कोई विवाद नहीं है और यदि कोई विवाद है तो वह बेटी के हिस्से के बारे में है। शेष सभी बातें अब प्रायः बीते युग की बातें हैं। विधान बना है और कई न्यायिक निर्णय आये हैं जिन के द्वारा परिवार के उन सभी सदस्यों को अधिकार दिये गये हैं जिन्होंने इसकी मांग की। अब यदि कोई विवाद है तो वह केवल लड़की के हिस्से के बारे में हैं। लड़के की तुलना में लड़की को आधा हिस्सा दिया जा सकता है, लड़के के बराबर लड़की को हिस्सा दिया जा सकता है, यह कोई दूसरा हिस्सा भी हो सकता है, जिस का फैसला आपस में बातचीत के द्वारा किया जा सकता है। मुझे पूरा विश्वास है कि सद्भावना और आपसी सूझबूझ से इस समस्या का कोई संतोषजनक समाधार ढूंढा जा सकता है। ऐसा नहीं हैं कि प्रवर समिति का हर सदस्य अपने निर्णयों से बाध्य है। हम सभी को अपने विचार व्यक्त करने की आजादी है। मैं निस्संकोच यह मानता हूँ कि कुछ चीजें ऐसी हैं जो मुझे पसन्द नहीं हैं। ऐसे सदस्य भी हैं जिनका यह कहना है कि उन्हें विधेयक के कुछ पहलू पसन्द नहीं है। अतः इन मतभेदों को कुछ हद तक आपसी बातचीत के द्वारा दूर करना होगा। लेकिन इसके अलावा मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या लड़की को कोई हिस्सा मिलना चाहिये। अब जब यह कहा जाता है कि लड़की को कोई हिस्सा नहीं मिल सकता तो मैं यह जरूर सोचता हूँ और मुझे अपने विचार निःसंकोच और अबाध रूप से व्यक्त करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है, कि परिवार के महिला सदस्यों के प्रति पुराने भेदभाव के कारण ही यह आपत्ति की जा रही है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः बिल्कुल ठीक। असली मुद्दा यही है।

डॉ. पी.के. सेनः हम अपने महिला सदस्यों का आदर करते हैं। निस्संदेह प्रायः यह कहा जाता है कि प्रत्येक परिवार की महिलायें शिष्टाचार की मूर्तियां और सेवारत देवियाँ हैं। यह बिल्कुल सही है किन्तु क्या हमें उनके प्रति जो कुछ करना चाहिये वह करते हैं? क्या हम अपने परिवारों में महिलाओं के प्रति वह सब करते हैं जो पुरुषों को महिलाओं के प्रति करना चाहिये। हमें इन चीजों में पूरी तरह ईमानदार और निस्संकोच होना चाहिये। हमारी महिलाओं के लिए बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता है। आज महिलायें समाज में अपना स्थान चाहती हैं। परिवार के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाते रहने और सेवा की मूर्ति बने रहने के साथ-साथ उन्हें कुछ और काम भी करना है। उन्हें सार्वजनिक कार्यों में रुचि लेनी है। उन्हें सामाजिक संगठनों में रुचि लेनी है। आज जो बहुत-सी समस्याएं सामने आ रही हैं, उनमें उनकी उपस्थिति अपरिहार्य रूप से आवश्यक है। अतः हम ऐसे सामाजिक ढांचे की संभवतया रचना नहीं कर सकते जिनमें महिलाओं का अस्तित्व ही न हो। महिलाओं को हमेशा पुरुषों की सेवा में लगे रहना चाहिये, अर्थात् उन्हें पुरुषों के आराम और कल्याण का ध्यान रखना चाहिये पर अपनी उच्च इच्छाओं और आकांक्षाओं के बारे में क्या कुछ नहीं करना चाहिये? समाज में उनको भी अपना