(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 194

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दायित्व निभाना है, क्योंकि स्वतंत्र भारत में हर संगठन में, हर आन्दोलन में, महिलाओं का एक बहुत बड़ा स्थान है जो उन्हें भरना है। ऐसी स्थिति में हमें उन्हें आजाद करना चाहिये और सबसे अधिक जरूरत उन्हें आर्थिक की जरूरत है। (शाबाश, शाबाश) अनेक मामलों में महिलाओं का जीवन इसलिए तबाह कर दिया जाता है कि उन्हें अपने अस्तित्व के लिए परिवार के किसी पुरुष सदस्य पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः वर्तमान परिस्थितियों में उनकी आर्थिक आजादी का प्रश्न काफी महत्वपूर्ण है।

हमें इस तथ्य को अनदेखा नहीं करना चाहिये। यदि हम आर्थिक आजादी देना चाहते हैं तो कोई कारण नहीं है कि हम अपना मूँह मोड़ लें और यह कहेंः फ्ओह यह लड़की, उसे हिस्सा नहीं मिल सकता, उसे परिवार में एक मूर्ति बन कर रहना होगा,य् जिसका अर्थ यह है कि वह सदैव निर्भर रहेगी और यदि वह विधवा है तो उसे अन्य लोगों के आराम का ध्यान रखने के लिए होगी और वह परिवार के प्रति या समाज के प्रति या राष्ट्र के प्रति कोई अन्य सेवा नहीं कर सकेगी। महोदय, मैं आगे नहीं जाना चाहता क्योंकि इसमें काफी समय लगेगा और मैं जानता हूँ कि मैं ऐसा करता हूँ तो अन्य सदस्यों का समय कम हो जायेगा। किन्तु इन मूलभूत बातों के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। इसके बारे में काफी चर्चा भी हो चुकी है। अब तक जो चर्चा हुई है उस पर जब मैं विचार करता हूँ तो मैं पूरी तरह कायल हो जाता हूँ कि इस वाद-विवाद के बाद हम एक मेज के गिर्द बैठकर चर्चा कर सकते हैं, और पूरी सद्भावना तथा सूझबूझ के साथ इस ब्यौरे पर विचार कर सकते हैं। तभी हम समाधान भी ढूंढ पायेंगे। ऐसी छोटी-छोटी बहुत-सी बातें हो सकती हैं जो हमें परेशान कर रही हैं, लेकिन उनका समाधान ज्यादा कठिन नहीं है। हमें मूलभूत बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा और हम ऐसा करते हैं तो हमारा मार्ग स्पष्ट हो जाएगा।

ऽश्रीमती कमला चौधरी (यू.पी.ः सामान्य)ः माननीय उपाध्यक्ष महोदय, इस हिंदू संहिता विधेयक के सम्बन्ध में कुछ शब्द कहने से पूर्व मैं माननीय मंत्री अम्बेडकर साहब को इस विधेयक को पेश करने के लिये बधाई देना चाहती हूँ। मेरा ऐसा विचार है कि यह विधेयक अपने समय के अनुकूल इस सदन के सामने आया है। आज जमाने की जो रफतार है, जो समय की मांग है, यह उसके बिल्कुल अनुकूल है। हालांकि इसका विरोध धर्म, संस्कृति और तरह-तरह के नाम लेकर किया जा रहा है और विरोध के प्रचार में भी हर तरह की बातें इसके विरोध में सुनते हैं। लेकिन मेरा अपना यह विचार है कि महिला समाज के लिये, हमारे भारतीय समाज की प्रगति के लिये, यह बिल एक रामबाण की तरह साबित होगा और इससे हमारे भारतीय महिला समाज का, जो आज शताब्दियों से अधःपतन को प्राप्त हो रहा है, कल्याण होगा और इससे अधिक

ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 13 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 535-40