(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 195

180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आगे आनेवाला भारतीय महिला समाज भी इस विधेयक के लिये, अगर यह इस संसद में पारित हो जाता है, तो हमारे मंत्री महोदय का और इस सदन के सदस्यों का आभार मानता रहेगा।

जो लोग इसके विरोध में है उनका कहना है कि इस विधेयक से हमारे धर्म की हानि है, और हिंदू संस्कृति की हानि है। यह बात मुझे किसी तरह से दिखलाई नहीं देती। यह दूसरी बात है कि हमारे देशवासियों का दिमाग, हमारा दिल, कुछ इस तरह का बना हुआ है कि धर्म के नाम पर कोई भी बात कही जाये तो वह यहां के लोगों को बहुत अपील करती है। इसी धर्म के नाम पर किस प्रकार हमारे यहां साम्प्रदायिक भावना को प्रोत्साहन दिया गया। इसी धर्म के नाम पर हमने अपने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का खून होते तक देखा है।

इसी प्रकार मैं देखती हूँ कि इस विधेयक के विरोध में भी, धर्म की दुहाई देकर, भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर, उन व्यक्तियों, हमारी उन बहनों को, जो अभी यह भी नहीं समझ सकतीं कि कानून क्या चीज है, यह सभा किस प्रकार बनी हुई है, हमारे संविधान में उनको दिया गया जो मताधिकार है वे उसको भी नहीं समझ सकतीं, उनको यह कह कर बरगलाया जाता है और इस तरह की पुकार मचाई जाती है कि इस देश की बहुत बड़ी संख्या इस विधेयक का विरोध करती है। लेकिन जहां तक मेरी तुच्छ बुद्धि पहुंच सकी है, मुझे इस विधेयक में कोई भी बात किसी भी प्रकार ऐसी नहीं मालूम होती जो कि हमारे धर्म के या हमारी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध हो।

इस विधेयक के एक भाग में ऐसा प्रावधान किया गया है कि आज जो हिंदू धार्मिक मानसिकता वाले पुरुषों को एक पत्नी के होते हुए, एक दो या कई विवाह करने का अधिकार है, इसका विरोध किया गया है। इसकी अुनमति नहीं दी गई है, यानी बहुविवाह की और उस पर प्रतिबंध लगाया गया है। मैं बहुत नम्रतापूर्वक कहना चाहूंगी कि मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बड़ी संख्या में आज हमारे भाई जो इस विधेयक का विरोध करते हैं, वह शायद इसी लिये करते हों कि उनके ऊपर यह एक प्रतिबंध लगाया जा रहा है कि एक पत्नी के होते हुए वह अनेक विवाह नहीं कर सकेंगे। लेकिन धर्म के विरुद्ध इसमें मुझे कोई बात नहीं मालूम होती, क्योंकि हमारे धार्मिक ग्रन्थ और हमारे प्राचीन साहित्य को देखने से मुझे ऐसा ही मालूम होता है कि किसी भी जमाने में, प्राचीनकाल में भी, हमारे यहां बहुविवाह की प्रथा कोई अच्छी नहीं जानी जाती थी। प्राचीन इतिहास उलटने से ऐसे उदाहरण तो हमको मिलते हैं, कि जो राजा होता था उसको कई विवाह करने की अनुमति थी। हमारे समाज का जो ढांचा था उसमें जो रीति-रिवाज थे, जो पद्धति थी, जो परम्परा थी और जो उच्च आदर्श थे, और जिन आदर्शों को उच्च कोटि का माना जाता था, उनकी अवहेलना करते राजाओं को तो देखा जाता है, लेकिन जो मर्यादा पुरुषोत्तम हुए हैं, जिन्होंने हमारे सामने एक आदर्श