(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 196

181

रखा है, उनका एक उदाहरण मैं आपके सामने देना चाहती हूँ। हमारे बाल्मीकि द्वारा लिखे महाकाव्य को देखने से, जिस महाकाव्य ने हमारी भारतीय संस्कृति की रक्षा की है और जिस पर शताब्दियों से हमारी संस्कृति अवलम्बित है, मालूम होता है कि जब राजा रामचन्द्र अपनी धर्मपत्नी सीता का परित्याग करने के बाद जब अश्वमेघ यज्ञ करने बैठे हैं और जब पुरोहितगण और गुरुजनों ने उनको बतलाया कि बिना पत्नी के यज्ञ सम्पूर्ण नहीं होता, उस समय भी वह सीता की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर ही यज्ञ करते हैं, दूसरा विवाह नहीं करते। यह आदर्श हमारे सामने हैं, और अगर हम अपने उस महाकाव्य को पढ़ें तो जगह-जगह हमको यह दिखाई देगा जिस समय रामचन्द्र जी वन में रह रहे थे और शूर्पनखा ने उनसे विवाह करने की प्रार्थना की थी तो लक्ष्मण ने उसको जवाब दिया था कि रामचन्द्र अयोध्या के राजकुमार हैं और अयोध्या के राजा होने वाले हैं, वह विवाह कर भी सकते हैं, लेकिन मैं तो विवाहित व्यक्ति हूँ, मैं और विवाह नहीं कर सकता। उस समय तो रामचन्द्र जी के मुख से जो हमारे महाकवि ने कहलाया है वह उसी आदर्श का प्रतिपादन करने वाला है कि बहुविवाह की प्रथा अच्छी नहीं माना गई थी।

इस विधेयक में बहुविवाह पर जो प्रतिबंध लगाया गया है, मेरी समझ में नही आता कि किस तरह से इससे धर्म का विरोध होता है। बल्कि, मैं समझती हूँ कि यदि ऐसे कृत्यों को प्रोत्साहित किया गया तो इससे निःसंदेह जो ऊंचा आदर्श हमारे भारतीय समाज, हमारी संस्कृति में है। इससे छिन्न-भिन्न होगा, मैं समझती हूँ कि किसी भी हिंदू धर्मावलम्बी या किसी भी भारतीय संस्कृति पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति के लिये एक यही आदर्श है। यह तो स्त्री के लिए बड़ा भारी अन्याय है कि उसका पति अपनी धर्मपत्नी के होते हुये भी एक, दो, तीन और चार विवाह कर सकता है। यह स्त्री के लिये समवेदना का विषय है और सबसे भयानक दुःख की वस्तु है। यह एक दूसरी बात है कि शताब्दियों से हमारे यहां स्त्री समाज पर प्रतिबंध रहे हैं और यहां की नारियां एक प्रकार से घर की चारदीवारी के अन्दर बंद रहती हैं। उनके सामाजिक अधिकार, उनके मानसिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया गया है। उनकी आंखों के आंसू आंखों में सूख जाते हैं और उन्हें टपकने तक नहीं किया जाता। लेकिन हमारे कवियों ने, हमारे लेखकों ने, हमारे साहित्यकारों ने इस महान दुख का जो नारी के ऊपर होता है, अच्छी तरह से चित्रण किया है। एक सौत से बड़ा दुःख, जो नारी के लिये होता है उससे महान् दुःख उसके लिये कोई और नहीं है।

आज जबकि पुनर्जागरण युग आरम्भ हो चुका है, और हमारे देश के महापुरुषों ने नारियों की कठिनाइयों का अनुभव किया है और इन लोगों की कृपा से नारियों की समस्याओं पर भली प्रकार से विचार किया गया है और समय-समय पर कई क्रांतिकारी विधेयक भी इस सदन में पारित हुए हैं। उस वक्त जब देश में आन्दोलन हो रहे थे, और विशेषकर महात्मा गांधी हमारे समाज के सामाजिक ढांचे में आकर खड़े हुए थे और उन्होंने नारी को इस स्थिति में पहुंचा दिया था कि वह अपने आप खड़ी हो सके।