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पद्धति है, जिस समय विवाह होता है उस समय पंडित इस तरह परिभाषित करते हैं कि यह साहश्चर्य सम्बन्ध इतना टिकाऊ है, ऐसा अमर है कि जन्म जन्मान्तर तक यह सम्बन्ध अटूट रहेगा। मेरा इसमें विश्वास नहीं है। क्योंकि, मैं जानती हूँ कि यह साहश्चर्य जो एक हिंदू पुरुष और सभी के बीच होता है, जन्म जन्मान्तर का सम्बन्ध है वही दूसरी तरफ हमारे यहां धर्म ग्रन्थों में बताया गया है कि कर्म के दर्शन अनुसार यह साहश्चर्य निरन्तर तब भी चलता रहेगा यदि पूर्व जन्म में उसका पति मानव होगा या एक दानव होगा या एक पशु होगा। किन्तु इस तरह की चीजों में मेरा विश्वास नहीं है। मेरा यह विचार है कि विवाह एक है जो कि जीवन भर के लिये समझौता होता है। अगर हमारे दामपत्य-युग्म का दिमाग विवाह-विच्छेद के कानूनी पहलुओं की तरफ रहे तो मैं समझती हूँ कि जीवन निरर्थक हो जाएगा। ऐसी शर्तों का परिणाम तो यह होगा कि लोग कभी भी उठने के योग्य और सुखी गृहस्थी नहीं रख सकेंगे। अगर कहीं पर इस तरह की समस्या है तो ऐसी अवस्था में न तो धर्म का ही विकास हो सकता है और न संस्कृति का ही विकास हो सकता है। अगर कहीं पर किसी कारणवश सम्बन्ध-विच्छेद आवश्यक है तो मैं समझती हूँ कि उसका कानूनी अधिकार औरत को होना चाहिये। आज हमारे समाज में बहुत-सी कठिनाइयां आ गई हैं। मैं समझती हूँ कि ऐसे दृश्य मेरी ही आंखों के सामने नहीं हैं, बल्कि यहां पर जो महानुभाव बैठे हैं उन सब के सामने हैं। एक पति दूसरी शादी कर सकता है जबकि उसकी पत्नी की उम्र थोड़ी ही हो और दूसरी तरफ वह स्त्री जिस की उम्र 16, 17 और 18 वर्ष की ही हो, वह दूसरी शादी नहीं कर सकती_ उसको इस बात का अधिकार नहीं है कि वह विवाह का विघटन कर ले। इसका परिणाम क्या होता है? मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहती। मैं तो सिर्फ नम्रतापूर्वक इतना ही कहना चाहती हूँ कि इसका परिणाम भयंकर होता है, खराब होता है। वह स्त्री कानून के कारण दूसरा विवाह नहीं कर सकती है। हमारे कानून में जो उसका पति है उसका उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। क्या वह इस समाज में अधोगति में पड़ी रहे और अति कष्ट-दुःख भोगती रहे और फिर भी समाज उसको सम्मानपूर्वक दूसरा विवाह करने की इजाजत, किस तरह वह अपने बच्चों का पालन-पोषण कर सके, घर-गृहस्थी जमा सके, और अपना शेष जीवन सुखमय तरीके से बीता सके।
ऐसी परिस्थितियों में मैं चाहती हूँ कि स्त्री के पास यह अधिकार होना चाहिए। मैं चाहती हूं कि स्त्री के पास अधिकार होना चाहिए। मैं नहीं चाहती कि इस अधिकार का आम तौर से प्रयोग हो कि इसकी प्रतिक्रिया आरम्भ हो जाये और हर एक स्त्री अथवा पुरुष इस तरह सोचने लगे कि वह जब चाहें तब उनका सम्बन्ध-विच्छेद हो सकता है जहां तक मैं समझती हूँ इस विधेयक में इतनी सहूलियत भी नहीं है कि जितना लोगों ने कह रखा है। सबसे बड़ी खूबी जो मुझे इसमें नजर आती है वह यह है कि हमारे यहां 80 फीसदी समुदाय, मैंने यह देखा है कि पंचायत बैठ गयी और एक मिनट में सम्बन्ध-विच्छेद हो गया। कहीं-कहीं और कुछ समुदायों में तो पंचायत बैठ कर भी फैसला नहीं करती। स्त्री-पुरुष बिल्कुल आजाद हैं और एक-दूसरे को छोड़कर, वे जिसको भी