हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 21

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहां तक एक पत्नीत्व का प्रश्न आता है, कोई भी सदस्य इसके विरुद्ध नहीं हो सकता। जहां तक एक पत्नीत्व के परिणामों का सम्बंध है, मैं जानता हूँ, इसका पारित करना उस क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित करेगा जहां से मैं आता हूँ। चूंकि आज भी, परिस्थितियों के अनुसार यदि कोई अपनी विधवा छोड़कर मरता है, उस विधवा को उसके छोटे भाई से पुनर्विवाह कर दिया जाता है। मैं जानता हूँ कि भविष्य में हम इन कालातीत-रिवाजों को नहीं चला पायेंगे। मैं समझता हूँ कि इस कालातीत प्रणाली के दोषों के बारे में उन लोगों को बताया जाये और इसके बारे में स्पष्ट किया जाये जो इससे प्रभावित होंगे, तो वे भी इस प्रणाली को त्यागने के लिए तुरन्त तैयार हो जायेंगे।

जहां तक एक के प्रश्न का सम्बंध है और उन लोगों का जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि ये लोग अपनी आवश्यकताओं और बुद्धि के अनुसार उस समय इस सिद्धांत के बारे में सोचा और स्वीकार किया था जब विधवा पुनर्विवाह भारत में प्रचलित नहीं था। बिना किसी आपत्ति के मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि जहां तक एक पत्नीत्व, जातिप्रथा का उन्मूलन और महिलाओं को पूरे अधिकार दिये जाने का प्रश्न है, मैं उनका पूर्ण समर्थन करता हूँ।

जहां तक तलाक के प्रश्न का सम्बंध है, मैं जानता हूँ कि तलाक की प्रणाली भारत के अधिकांश भागों में विद्यमान है, पर इन दिनों कुछ लोगों को तलाक देने की प्रणाली बुरी लगती है। वास्तव में, हमारे जैसे देश में जहां रीति-रिवाजों के अनुसार महिलायें सती हो जाया करती थीं। तलाक की प्रणाली के बारे में विरोधी मत आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे विश्वासों के अनुसार विवाह एक अविभाजित सम्बंध है और इस दृष्टिकोण से तलाक का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिये। परन्तु मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि हमारे देश में तलाक देने की प्रणाली सदैव रही है और यह आज भी विद्यमान है। यदि लोग अपनी आंखें मूंदकर चलना चाहते हैं और यदि वे यह देखना नहीं चाहते कि उनके चारों ओर विश्व में क्या घट रहा है, तो यह उनके अपने सोचने-समझने की बात है। डॉ. अम्बेडकर ने हमें बताया है कि यह प्रणाली इस देश के 90 % लोगों में पायी जाती है। मैं इस बारे में निवेदन करता हूँ कि ये आंकड़े अधिक अनुमानित आंकड़ों की तुलना में कम अनुमानित आंकड़े हैं। जहां तक एक ओर भारत में इसके प्रचलन का प्रश्न है मैं पूर्णतयाः इसका समर्थन करता हूँ, इस कारण नहीं कि ये आज के समाज में विद्यमान है बल्कि इस तथ्य के लिए कि यह हमारे रीति-रिवाजों में से एक है। इसलिए मैं तलाक के पक्ष में हूँ।

प्रश्न यह उठता है कि इस हिंदू संहिता विधेयक में, जैसा कि प्रवर समिति से उभरा है, इसका मुख्य दोष यह है कि यह दूरदर्शी नहीं है। वास्तव में, हमारे देश में जो रीति-रिवाज प्रचलित हैं और प्रवर समितिओं द्वारा जो सुधार सुझाये गए हैं, बहुत ही कम हैं। पंजाब के लोग इतने पिछड़े नहीं हैं। जहां तक, सामाजिक सुधारों का प्रश्न है, पंजाब के लोग