(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 200

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जाये कि ऐसा भी होने वाला है तो मैं कहूंगी कि आज कितना बड़ा अन्याय है। वह दृश्य मेरे सामने आ रहे हैं कि जो हमारे बड़े-बड़े ताल्लुकेदार हैं उनके यहां यह देखा जाता है कि पिता की सम्पत्ति पर भाई जश्न मना रहे हैं। वे खुद के लिये तीज आदि त्यौहारों में इतना खर्च कर देते हैं जो बहन के सारे जीवन के लिये काफी होता। यदि उसी घर में, अगर बहन विधवा हो कर जाती है और रहने लगती है तो उसका स्थान वहां सिर्फ रसोई की नौकरानी से ज्यादा अच्छा नहीं रह जाता। उसी घर में जहां कि आज पिता की संपत्ति पर, पिता के वैभव पर, भाई बहुत मजे करते हैं, उसी जगह मैंने बहन को अपनी आंखों से देखा है कि जो अपने छोटे बच्चों के लिये दूध के वास्ते भी तरसती है। उसके मन में भी इच्छा होती है कि मेरे भतीजे जिस तरह अच्छे कपड़े पहनते हैं, जिस तरह उनकी अच्छी शिक्षा होती है, उसी तरह मेरे बच्चों को भी खाने को मिले, पहनने को मिले, और अच्छी शिक्षा मिले। लेकिन कानून ने उसकी जबान पर ताला डाल रखा है। और इसलिये उसके आंसू उसकी आंखों में ही सूख कर रह जाते हैं। मैं बड़े अदब से पूछना चाहूंगी, उन लोगों से जो आज इसका विरोध कर रहे हैं, कि क्या यह हिंदू धर्म के अनुकूल है और यदि ऐसा है तो जो आज यह अन्याय नारी के ऊपर किया जाता है, उसकी अनुमति हमारे धर्म का कौन-सा सिद्धांत देता है? इसलिये मैं समझती हूँ कि जो इस विधेयक में यह पिता की सम्पत्ति में लड़की के अधिकार की बात रखी गयी है,वह समय के अनुसार बहुत उपयोगी है और हमारी संस्कृति और धर्म के अनुकूल है। और मैं उम्मीद करूंगी कि यहाँ बहुत उदारतापूर्वक इस पर विचार किया जायेगा।

इस प्रावधान के विरोध में बहुत लोगों ने यह भी कहा है कि यह विचार कि पैतृक सम्पत्ति में नारी का कोई हिस्सा होना चाहिये यह लोगों के मस्तिष्क की उपज है जिन पर विदेशी संस्कृति की छाप है और जिन्होंने भारतीय साहित्य नहीं पढ़ा है। मैं आपका बहुत समय न ले कर थोड़े ही समय में बताना चाहूंगी कि जिन्होंने लोक-संगीत सुना है, उसमें यह भावना आज से नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों से भरी हुई है। यह भावना हमारे लोक गीतों में हमारी मां-बहन के समय से नहीं, हमारी दादी परदादियों के समय से चली आ रही है कि जब कहीं पर भी विदेशी संस्कृति का नाम निशान तक नहीं था, जिस समय हमारी संस्कृति पर उसकी कोई छाप नहीं थी। शादी के समय हमारे प्रान्त में जो गीत गाये जाते हैं उनमें यह भावना भरी है और मैं समझती हूँ कि सभी प्रांतों में शादी के वक्त ऐसे गाने गाये जाते हैं। उन गीतों की पंक्तियों को मैं यहां दुहराना नहीं चाहती लेकिन संक्षेप में यह बताना चाहूंगी कि हमारे यहां विवाह पर जो गाने गाये जाते हैं, कम से कम हमारे प्रांत में, जहां से मैं परिचित हूँ। कुछ दूसरे प्रांतों का भी ग्रामीण साहित्य मैंने देखा है और वहां भी इस तरह की पद्धति है और गानों में बड़ी अच्छी भावना हमको मिलती है जहां लड़की यह विचार जाहिर करती है कि मेरे पिता का जो राज्य है उसमें मैं आधा हिस्सा चाहती हूँ। भाई उसको तरह-तरह के प्रलोभन देकर कहता है कि मैं तुझको थाल भर के जेवर दूंगा, घोड़े दूंगा, हाथी दूंगा और दहेज में इतना