(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 201

186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सारा सामान दूंगा। लड़की कहती है कि अगर मेरे भाग्य में यह वैभव लिखा है तो यह तो मुझको अपने ससुर अपने पति के यहां भी जा कर मिल सकता है। लेकिन मैं तो अपने यहां आधा हिस्सा चाहती हूँ। मैं तो इसी घर में पली हूँ और यहां जो फुलवाड़ी है उसका हिस्सा चाहती हूँ, तालाब चाहती हूँ। तो इस तरह की भावना के लिये जो लोग कहते हैं कि यह विदेशी साहित्य का असर है या विदेशी शिक्षा का असर है या विदेशी संस्कृति का असर है, या विदेशी शिक्षा में पढ़े हुए लोगों के दिमाग की उपज है, यह बात बिल्कुल निराधार है। यह भावना पुराने साहित्य में भरी पड़ी है और जो पुराने ग्राम गीत हैं उनमें तरह-तरह के ऐसे दृष्टान्त मिल जायेंगे, जिनमें यह भावना होती है।

और कुदरत ने लड़के-लड़की को माता-पिता के लिये बिल्कुल एक-सा बनाया है। आज क्या कारण है कि पिता की सम्पत्ति में भाई का हक होता है, लड़की का कोई अधिकार नहीं है? मैं समझती हूँ कि यह भी एक अन्याय है। यह दूसरी चीज है कि आज हमारे समाज की जिस तरीके की व्यवस्था है, उनके अनुसार शायद कुछ लोगों को इस विधेयक को अमल में लाने में सन्देह और मुश्किल मालूम हो, क्योंकि हमारे समाज में हमारी सोसायटी में ‘दामाद’ की जो प्रतिष्ठा है, विशेष किस्म की जो है। जिन्दगी भर उसको ‘जमाई बाबू’ या ‘पाहुना’ कह कर पुकारा जाता है और कभी भी वह उस परिवार का सदस्य नहीं बन पाता। मैं समझती हूँ कि अगर यह अधिकार लड़की को मिल जाता है, तो उससे जो दूसरे घर का लड़का अपने घर में दामाद बन कर आयेगा, वह भी उसी तरीके से जिस तरह से एक पिता के दो लड़के हों। कन्या परिवार के सदस्य के तौर पर एक तीसरे लड़के की तरह रह सकता है और इस तरह से आपस में मोहब्बत बढ़ सकती है। यह दलील मुझे अपील नहीं कर पाती कि इससे भाई बहिन का जो आपस का सम्बन्ध है, वह खराब हो जायेगा, यह वह नष्ट हो जाएगा। मैं ऐसा नहीं समझती कि अगर यह कानून पारित हो जायेगा तो हमारी सामाजिक मर्यादा, हमारी सांस्कृतिक मर्यादा, हमारी धार्मिक मर्यादा सारी छिन्न भिन्न हो जाएगी। मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ। इन शब्दों के साथ मैं यह आशा करती हूँ कि जिन लोगों ने हमारा नया सं. विधान पारित किया है, जो सामने आए हैं हमारे सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन करने और जिन्होंने संविधान में स्त्री को समानाधिकार देने की बातें कही गयी हैं, एक ठण्डे दिमाग से महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर विचार करेंगे। उन्हें ध्यान से सुनने दें कि आज समय की क्या मांग है। समय की क्या पुकार है, किस अधिकार को हमको तुरन्त दे देना चाहिये। विद्वानों, साहित्यकारों और इतिहासकारों का मत है कि कोई भी समाज जब तरक्की के मैदान में आगे होता है, तो जो परिवर्तन उसको तुरन्त कर डालने चाहिए, अगर वह परिवर्तन तुरन्त नहीं कर डालता, तो वह समाज तरक्की में शताब्दियों पीछे पिछड़ जाता है। दूसरी तरफ, अगर वह समय की मांग का और समय की आवश्यकता का अनुभव करके जो परिवर्तन उसे तुरन्त कर डालने चाहिये, अगर वह