(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 202

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उसे तुरन्त कर डालता है तो हमारी तरक्की होती है। मैं यह आशा करती हूँ कि यह विधेयक वर्तमान सदन द्वारा ही यहां पारित होगा, क्योंकि यहां वे व्यक्ति इस असेम्बली में अधिक संख्या में मौजूद हैं जो कि महात्मा गांधी के अनुयायी कहे जाते हैं। महात्मा गांधी वह महापुरुष थे, जिन्होंने हमारी भारतीय नारी-समाज की समस्याओं और हमारे व्यवधानों को बहुत अच्छी तरह से समझा और राजनीतिक क्रांति के साथ-साथ उन्होंने हमारी जो पुरानी सामाजिक रूढि़यां थीं, उनको बहुत जल्द तोड़-फोड़ कर फेंक दिया। मैं समझती हूँ कि उस महात्मा गांधी के अनुयायी इस विधेयक पर सहानुभूति और उदारतापूर्वक हमारे धर्म और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विचार करेंगे। अन्त में मैं फिर एक बार अपने माननीय मंत्री महोदय को नारी समाज की तरफ से यह विश्वास दिलाना चाहती हूँ कि इस देश की वे सब नारियां जो इसको समझ सकी हैं, वे इसका हृदय से स्वागत करने जा रही है। और वे नारियां जो आने वाली पीढ़ी की हैं वह भी इस विधेयक के पारित करने के लिये उनका आभार मानेंगी।

ऽश्री कामेश्वर सिंह, दरभंगा (बिहारः सामान्य)ः महोदय, इस सत्र के पहले दिन हमारे समक्ष इस सभा में विधेयक के बारे में प्रधान मंत्री ने जो कुछ कहा उसके बाद हमारे लिए, जो सरकार की ओर से पेश किये गये प्रस्ताव का विरोध करते हैं, इस वाद-विवाद में भाग लेना कठिन हो गया है। जब उन्होंने अपना वक्तव्य दिया उस समय मैं सभा में उपस्थित नहीं था लेकिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरें सही हों, तो उन्होंने विधेयक को पारित करने के प्रश्न को अपनी सरकार में विश्वास का एक प्रश्न बना लिया है। मैं इस विधेयक का पुरजोर विरोध करता हूँ। (व्यवधान)

माननीय उपाध्यक्षः शांति, शांति। यदि इस प्रकार व्यवधान डाला जायेगा तो कुछ नहीं होगा। व्यवधानों से केवल सदस्यों द्वारा लिये जाने वाले समय में वृद्धि होगी।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः स्पष्टतया माननीय सदस्य एक बहुत अच्छा भाषण दे रहे हैं।

श्री कामेश्वर सिंह, दरभंगाः लेकिन मेरा यह दृष्टिकोण भी उतना ही स्पष्ट है कि इस समय हमारे देश की जो स्थिति है उसे देखते हुए हमारे प्रधानमंत्री की सरकार सर्वोत्तम है। इसमें जितनी भी खामियां हों, वर्तमान सरकार का बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। मैं समझता हूँ जिन लोगों का किसी राजनैतिक दल से सम्बन्ध नहीं है उनमें से अधिकांश की यही राय है। अतः हमारे प्रधानमंत्री द्वारा अपनाया गया रुख, मेरे जैसी विचारधारा वाले लोगों के लिए ‘अवपीड़न’ नहीं तो ‘अनुचित प्रभाव’ की शक्ल ले लेता है। अतः मैं ईमानदारी से प्रधानमंत्री से इस मामले पर पुनर्विचार करने और इस विधेयक

ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 13 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 541-43