188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को पारित किये जाने के प्रश्न को अपनी सरकार में विश्वास के प्रश्न से न जोड़ने का अनुरोध करता हूँ।
मैं चाहता हूँ कि सभा तथा सरकार इस विधेयक पर आगे विचार तब तक के लिए स्थगित कर दें जब तक जैसे कि पिछले वर्ष हमारे प्रधानमंत्री को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से माननीय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा भेजे गये नोट में दिये गये कारणों से एक, आगामी आम चुनावों में मतदाताओं की आकांक्षाओं का पता नहीं लग जाता।
इस सभा के माननीय सदस्य जानते हैं कि इस विधेयक पर जिसे यदि मैं कहूँ क्रांतिकारी चरित्र का विधेयक के सम्बन्ध में अलग-अलग राय हैं। इससे काफी लोगों की व्यक्तिपरक विधि पर प्रभाव पड़ता है। इससे उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन तथा रीति-रिवाजों पर भी प्रभाव पड़ता है जिनका विकास पिछली कई शताब्दियों में हिंदू विधि की विभिन्न विचारधाराओं के साथ हुआ है। एकरूपता और संहिताकरण के नाम पर इससे, मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों को छोड़कर, पूरे हिंदू समुदाय के मूलभूत सामाजिक और धार्मिक ढांचे को मनमाने ढंग से तोड़ने का खतरा हो गया है। महोदय, मैं इस विधेयक सम्बन्धी प्रवर समिति के प्रतिवेदन में दिये गये आपके तथा श्री राम नारायण सिंह के द्वारा असहमति में दी गई टिप्पणियों से पूरी तरह सहमत हूँ। वर्तमान विधानमंडल के सदस्यों को इस विधेयक के मुख्य मुद्दों के बारे में भी जनता का जनादेश प्राप्त नहीं है। आखिरकार, आगामी चुनाव ज्यादा दूर नहीं है और इस मामले को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जाता है, तो भी कुछ नहीं बिगड़ेगा।
मेरा यह निश्चित मत है कि इस विधेयक में जिस प्रकार के महत्वपूर्ण परिवर्तनों का प्रस्ताव किया गया है, इस ढंग से नहीं किये जाने चाहिए। हिंदू विधि समिति के समक्ष रखे गये विचारों की समीक्षा करें तो हमें पता चलेगा कि इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया गया है। मैं उस वर्ग का व्यक्ति हूँ जो स्मृति और उसकी व्याख्या को परम पावन समझता है_ और मैं जिस वर्ग का हूँ उसमें देश की कुल आबादी के अधिकांश लोग आते हैं। हम विवाह, उत्तराधिकार आदि जैसे विषयों को अपने धार्मिक कर्त्तव्य और दायित्व का अंग समझते हैं। हमारे लिए ये चीजें धर्मनिरपेक्ष अथवा सामाजिक तथ्यों से अधिक महत्व रखती हैं।
यह सही है कि सामाजिक ढांचे में धीरे-धीरे परिवर्तन आया है और परिस्थितियों के दबाव में इसमें परिवर्तन आ रहा है। किन्तु ऐसे परिवर्तन अपने आप विकसित हुए हैं और उन्हें ऊपर से थोपा नहीं गया है। इसके अलावा इन परिवर्तनों से आमतौर पर उन सिद्धांतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिस पर विभिन्न हिंदू समाजों पर लागू विधियां आधारित हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या विधेयक में प्रस्तावित परिवर्तन ऐसे हैं जो आम जनता ने स्वीकार कर लिये हैं और अब उनके लिए केवल कानूनी मंजूरी की