(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 204

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आवश्यकता है। इसके उत्तर में मैं जोर देकर कहूंगा फ्नहींय्। निस्संदेह स्मृति के लेखक और उनके व्याख्याता समय-समय पर परिवर्तन करते रहे हैं किन्तु वे ऐसा तब करते थे जब वे उन्हें लोकमत के आधार पर लागू करने की स्थिति में होते थे। अधिकांश लोगों को उनके पाण्डित्य, उनकी दूरदर्शिता, उनकी प्रयोजन शुचिता और सबसे अधिक उनके आचरण में विपुल आस्था होती थी। इस प्रस्तावित बीसवीं शताब्दी के स्मृति-प्रवर्तकों की ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है। जनता के दिलों में उनका वह स्थान नहीं है, जो उन प्राचीन स्मृतिकारों के लिए था जिनके समादेश आज भी बहुत से लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। देश के विभिन्न भागों में जो विभिन्नता दिखाई देती है वह इस तथ्य का एक बड़ा प्रमाण है कि हिंदू व्यक्तिपरक विधि को लोगों ने स्वतः स्वीकार किया है और उसे किसी केन्द्रीय राजनैतिक प्रधिकरण द्वारा थोपा नहीं गया है। अनेकता में एकता हिंदू जीवन और धर्म का एक मुख्य लक्ष्ण है और हमें प्रतीयमान अनेकता को कोई ऐसी बुराई नहीं समझना चाहिये जिसे तुरन्त दूर करना आवश्यक है।

प्राचीन विधिवेताओं और वर्तमान विधिवेताओ के दृष्टिकोण में मूलभूत अन्तर यह है कि जबकि पूर्ववर्ती के विचार का आधार शुद्ध रूप से आध्यात्मिक होता था, उत्तरवर्ती के विचार का आधार पूर्णतया वस्तुपरक है और इसे स्वीकार करने का अर्थ हमारे जीवन दर्शन, हमारी परम्परा की अविच्छिन्नता और हमारी संस्कृति की नींव को तिलांजलि देना है। अतः मैं अपनी ओर से ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हूँ।

इसके अलावा मुझे अशंका है कि इस विधेयक के प्रावधानों को कार्यान्वित करने में व्यवहारिक कठिनाइयां होंगी। कल्पना कीजिये कि सरकार को लोगों को यह शिक्षा देने में कितना समय लगेगा कि उन्हें अपने विवाहों का पंजीकरण करवाने के लिए न्यायालय जाना चाहिये। कल्पना कीजिये कि अमान्य और शून्यकृत विवाहों के प्रावधान कितनी उलझनें और विभ्रांतियां पैदा करेंगे। कल्पना कीजिये कि विवाह विघटन और तलाक के प्रावधान से उन लोगों का घरेलू जीवन कितना तबाह होगा, जिनकी समाज के बारे में धारणा उस धारणा से बिल्कुल अलग रही है, जिस पर वे प्रावधान आधारित हैं। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ कि केवल दुसाध्य मामले ही उपचार के लिए आयेंगे। मुझे आशंका है कि रुचि रखने वाले बहुत से लोग अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिये अपने पड़ोसियों, सम्बन्धियों का घरेलू जीवन तबाह करने के लिए सामने आयेंगे। इसी प्रकार उत्तराधिकार सम्बन्धी प्रावधानों से सम्पत्ति का प्रबन्धन कठिन हो जायेगा और समाज में चालाक लोगों द्वारा षडयंत्र का एक बड़ा स्रोत बन जायेगा। वकील और अदालतें तो फल-फूल सकती हैं, किन्तु परिवार टूट जायेंगे और घरेलू शान्ति खत्म हो जायेगी।

हिंदू विधि समिति के एक सदस्य डॉ. द्वारकानाथ मित्तर के प्रतिवेदन में काफी सारे हिंदुओं के विचार दिये गये हैं। उन्होंने जिन तथ्यों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले हैं, उनका खण्डन नहीं किया जा सकता। समिति के अन्य सदस्यों का प्रतिवेदन