190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. मित्तर द्वारा अपने तर्क के समर्थन में दिये गये अखण्डनीय तथ्यों को स्पष्ट करने का मात्र एक प्रयास है। ऐसा प्रतीत होता है कि समिति के अधिकांश सदस्यों ने प्रमुख मुद्दों के बारे में अपना मन पहले ही बना लिया था और उन्होंने उनके समक्ष विभिन्न तरीकों से व्यक्त लोकमत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मुझे आश्चर्य होता है कि आज की भारत सरकार से, जो लोकमत के प्रति इतनी संवेदनशील है, इस सभा के समक्ष इस प्रकार का विधान लाना उचित समझा है। हिंदू समुदाय में कुछ तथाकथित ‘प्रगतिशील’ तत्वों की भावनाओं को तृप्त करने के लिए सरकार को ऐसा विधान नहीं लाना चाहिये था, जिसका अधिकांश हिंदू विरोध करते हैं। यदि वे लोग जो इस विधान को स्वीकार करने की बात करते हैं, गांवों का भ्रमण करें और इस विधेयक के प्रावधानों के बारे में हिंदुओं की प्रतिक्रिया एकत्र करें, तो मुझे विश्वास है कि उन्हें संतोषजनक समर्थन नहीं मिलेगा। कम से कम मेरे प्रांत में लोकमत निश्चित रूप से इस विधेयक के विरुद्ध हैं।
ऽडॉ. वी. पट्टाभी सीतारमैया (मद्रासः सामान्य)ः महोदय, मैं जब से आप के समक्ष खड़ा हुआ हूँ मुझे मित्रों से कुछ आवाजें सुनाई दी हैं। कुछ कहते हैं फ्समर्थन करोय्, अन्य कहते हैं फ्विरोध करो।य्
श्री बी.एल. सौंधी (पूर्वी पंजाबः सामान्य)ः आप दोनों करिए।
डॉ. बी. पट्टाभी सीता रमैयाः संभवतया मैं दोनों कर रहा हूँ, क्योंकि ऐसे मामले में हमारा कर्तव्य है कि हम हठधर्मी न बनें। महान् लोग ओर बेवकूफ ही हठधर्मी होते हैं और मैं दोनों में से किसी का दावा नहीं करता। अधिक अच्छा यह होगा कि हम अपने विचारों और दूसरों में तारतम्य स्थापित करें और कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करें जो हमने आरम्भ में गणित से सीखा है। समाज के ढांचे और कार्यप्रणाली पर पहुंचना आवश्यक है, क्योंकि समाज एक जीवन संगठन है न कि एक प्राणहीन संयुक्त स्टाक कम्पनी, जिसका एक अपना ज्ञान और अनुच्छेद होते हैं जो पंजीयक को तीन रुपये देकर किसी भी दिन बदले जा सकते हैं। यह हमारा यह समाज, जो हमें विरासत में मिला है और जिसका सदस्य कहलाने में हमें गर्व हैं, संभवतया हजारों वर्षों से अस्तित्व में है।
बाबू राम नारायण सिंह (बिहारः सामान्य)ः सृष्टि के आरंभ से।
डॉ. बी. पट्टाभी सीतारमैयाः यह कोई नहीं जानता कि यह कब अस्तित्व में आया। कम से कम मैं कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिले प्रमाण के आधार पर यह कह सकता हूँ कि इसने 2300 वर्ष पूर्व पूर्णता प्राप्त कर ली थी। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र
ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 13 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 543-52