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में जिन विवाह, अपराध, दण्ड सम्बन्धी समस्याओं तथा मनोवैज्ञानिक उलझनों, राजनैतिक समस्याओं का उल्लेख किया है वे आज भी बिना किसी अन्तर के हमारे सामने हैं। मेरे जिन मित्रों ने वह पुस्तक नहीं पढ़ी है, उनसे मैं वह पुस्तक पढ़ने का अनुरोध करूंगा। सूकर नीति सार पढि़ये हमारी प्राचीन हिंदू विधि की अन्य राजनैतिक रचनायें पढि़ये।
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः दुर्भाग्यवश कौटिल्य का अर्थशास्त्र यहाँ उपलब्ध नहीं है।
डॉ. बी. पट्टाभी सीतारमैयाः यह उन लोगों को अवश्य उपलब्ध है, जो इसे प्राप्त करने का इरादा रखते हैं।
श्री एल. कृष्ण स्वामी भारतीः किंतु मैंने भरसक प्रयास किया है।
डॉ. वी. पट्टाभी सीतारमैयाः अतः मैं सदन से उन पूर्व उदाहरणों और प्रगति की परिस्थितियों तथा विकास की परिस्थितियों पर गौर करने का अनुरोध करता हूँ जो ‘हिंदू समाज’ में परिवर्तन के प्रतीक हैं। मैं यह नहीं कहता कि हमें हिंदू समाज और हिंदू संस्कृति पर गर्व होना चाहिये। किन्तु जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं। वह बहुधा हिंदू संस्कृति है और जिसे भारतीय कहा जाता है, अधिकांशतः हिंदू समाज है। और यदि अन्य लोग यहां आये हैं और हमसे मिल गये हैं जैसे जाट, मुगल, तुर्क, अंग्रेज और अन्य, तो उन्होंने शायद हमारी बहुत-सी अच्छी बातों को आत्मसात किया है और उन्होंने हमें अपनी बहुत-सी अच्छी बातों को आत्मसात करने का अवसर दिया है और इसलिए हजारों वर्षों के इन संस्कृतियों के संगम से हमारी अपनी संस्कृति, विषय-वस्तु और मात्रा की दृष्टि से समृद्ध भी हुई है। अब हम इस वैभवशाली विरासत के उत्तराधिकारी हैं। हम इससे कैसे निपटेंगे? क्या इसके पीछे कोई दर्शन है या यह मात्र बेतरतीब विकास है? परिस्थितियों का संवर्धन, एक बेढंगी रचना जिसमें समानान्तर शक्तियां एक दूसरे से मूलभूत रूप से मिले बिना एक-दूसरे के समीप हैं या क्या यह एक ऐसा विलयन तथा सभी विभिन्न शक्तियों का समीकरण है जिस की खूबियां लुप्त हो गई हैं और दोष सामने आ गये हैं? हमें इन मुद्दों पर विचार करना है। क्या हमने यह बड़ा सुधार करने से पूर्व इन मुद्दों पर विचार किया है? इस सुधार का सूत्रपात किसने किया है? इसका सूत्रपात कब हुआ? किसके समय में इसका सूत्रपात हुआ? क्या इसे राष्ट्रीय सरकार के अस्तित्व में आने के बाद हाथ में लिया गया है या क्या यह पिछली सरकार की मात्र विरासत है, जो हमें सचिवालय के माध्यम से मिली है? इसमें हमने क्या किया है? इससे निपटने में हमारी क्या भूमिका है? मैंने आपको बताया है कि समाज, एक जीवन्त रचना है। इसके पीछे कुछ दार्शनिक तथ्य हैं।ं इसके समक्ष आर्थिक प्रस्ताव हैं। हिंदूस्तान को ही लीजिये। क्या आप ने विश्व में कोई ऐसा समाज देखा है, जो हिंदू समाज से जन्मजात और आन्तरिक दृष्टि से अधिक समाजवादी हो?