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आप आयातित किये जा रहे लोहे की अल्प मात्रा के शुल्क में छूट देना चाहते हैं, तो 3000 रुपये प्रति व्यक्ति पाने वाले तीन व्यक्तियों की आप नियुक्ति करते हैं, उनका एक टेरिफ बोर्ड बनाते हैं, देश के सभी पूंजीपतियों से प्राप्त सबूत के आधार पर उनसे एक प्रतिवेदन प्राप्त करते हैं, तत्पश्चात् आप उस पर वित्त विभाग में विचार करते हैं, आप उसे विधानसभा के समक्ष रखते हैं। और उसके बाद शुल्क में राहत देते हैं। आपने हमारे समाज के बारे में क्या किया है? आप इस पर इस प्राचीन समाज, इस प्राचीन वर्बरता के स्मृति चिन्ह पर, इस पुराने रद्दी माल पर, झपट्टा मारते हैं। नहीं_ आप कहते हैं फ्हमें पूरा समर्थन करना चाहिये।य्
हमने लंदन की शैली के अनुरूप अपने विश्वविद्यालय बनाये हैं_ हमने लंदन के उच्च न्यायालयों के अनुरूप अपनी कानूनी पद्धति अपनाई है और हमने पश्चिमी देशों की संसद की तरह अपनी विधान परिषदों तथा विधानमंडलों का गठन किया है और अब हमारे लिए पश्चिमी समाज, पश्चिमी रिवाजों, पश्चिमी सामाजिक संस्थाओं और पश्चिमी नागरिक कानूनों की नकल करना शेष रह गया है। कृपया मुझे गलत न समझें। मुझे काफी समय से तलाक से हमदर्दी हो रही है। मैं अपनी पत्नी को तलाक देने की बात सोचता रहा हूँ और मैंने यह भी सुना है कि वह भी तलाक लेना चाहती है। मुद्दा यह नहीं है। मैं आपको बता दूं कि मुझे इस विधेयक के कई प्रावधानों से हमदर्दी है। किन्तु मैं आपको बताना चाहता हूँ कि आप स्वराज प्राप्त करने के पश्चात् भारत की संस्थाओं के प्रति किस प्रकार का दृष्टिकोण और रुख अपना रहे हैं। यह सरलीकरण, इस प्रश्न से निपटने का यह नितान्त तात्कालिक तरीका, मेरी समझ तो क्या मेरी कल्पना को भी पसन्द नहीं आता। लेकिन मैं जानता हूँ कि आप मुझे कहेंगेः फ्ओह, यह विधेयक तब से अधर में लटका हुआ है, जब से कांग्रेस ने विधानमंडल को छोड़ा है।य् मैं मानता हू कि यह अधर में लटका हुआ है। तथापि आप याद करें कि जुलाई, 1938 में कांग्रेस ने यह संकल्प पारित किया था कि इसे विधानमंडल का बहिष्कार करना चाहिये, क्योंकि मिश्र और सिंगापुर में फौजें भेजी गई थीं जिन्हें उस समय भारत की सीमायें समझा जाता था। अतः उस कार्यवाही के प्रति विरोध के रूप में और सरकार के आश्वासन भंग के विरोध के रूप में, विशेष अनुज्ञा के बिना विदेशों में कोई सेनायें नहीं भेजी जाएंगी, हमने विधानमंडल का बहिष्कार किया था और उसके बाद हमने 1946 तक विधानमंडल में प्रवेश नहीं किया। इस अवधि के दौरान उन लोगों को जो देश भक्त नहीं थे, जो पश्चिमी सभ्यता के आश्रित थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी इंग्लैण्ड या अन्य देशों में बिताई, एक समिति में शामिल कर लिया गया और उन्होंने हमारे लिए यह नियम बनाया। अक्तूबर, 1944 में, जब हम अहमदाबाद जेल में थे, हमें हिंदू विधि सुधार समिति का पहला प्रतिवेदन प्राप्त हुआ। अब इस विधान के मुख्य प्ररेक तथा एजेन्ट श्री वी.एन. राउ हैं, जिनके कारण हमें वह सब कुछ मिला है जो नये संविधान में है। वह एक वकील हैं