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इंग्लैण्ड के कानूनों की नकल करके इसके समानान्तर व्यवस्था खड़ी कर सकते हैं? आप इससे अधिक कुछ नहीं कर सकते जितना कि हाथ की कताई की अर्थव्यवस्था ने किया है जो राष्ट्रपिता गांधी ने पुनः खोजा है। माफ करें मैं घृष्टता के साथ यह कह रहा हूँ कि मैंने 1938 में एक पुस्तक लिखी थी जिसको ‘हिंदू होम रीडिस्कर्वड’ कहा जाता है। चूंकि मैंने एक अधर्मी की तरह जीवन में प्रवेश किया, ईसाई परम्पराओं और पश्चिमी धर्म के अनुसार मेरा पालन-पोषण हुआ, मैं हिंदू समाज के हर त्यौहारों में, हर समारोह में और हर धार्मिक अनुष्ठान में काफी कुछ धार्मिक, उत्साहपूर्ण, प्रेरणादायक और परिष्करणकारी अनुभव करने लगा। तब मैं अपनी बहनों अपने भाइयों के साथ रहने लगा तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे कोई नया घर मिल गया है और पच्चीस वर्ष बाद मैंने यह छोटी-सी पुस्तक लिखने का साहस किया जिसमें मैंने इन चीजों को आदर्श रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि जीवन में ऐसे आदर्श विद्यमान नहीं हैं किन्तु जब आप किसी संस्था पर विचार करते हैं तो आपको इसके शुद्ध स्वरूप पर विचार करना चाहिये न कि इसके विकृत स्वरूप पर। यदि आप किसी धारणा को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, किसी संस्था को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं और इसे पुनर्जीवित करना चाहते हैं तो इसे बीज रूप में राष्ट्र के समक्ष रखें और उस पर राष्ट्र की सहमति प्राप्त करें। मैं आपको आश्वासन दे सकता हूँ कि मैं जहां कहीं जाता हूँ तो मैं इस विधेयक के सभी पहलुओं की अच्छाइयों और बुराइयों को लोगों के सामने रखता हूँ। पार्सन के अंडों की तरह इस विधेयक के कुछ अंश अच्छे हो सकते हैं और इसके कुछ अंश खराब हो सकते हैं। यदि आप कहते हैं कि आपको महिलाओं के लिए यह करना चाहिये महिलायें अपने आपको पहचानने लगी हैं तो मैं कहूंगा कि ऐसा जरूर कीजिये। लेकिन इसमें इतनी जल्दबाजी क्यों? मैं चाहता हूँ कि वे अपने को पहचानें, वे अपने को पहचान गई हैं और अगली विधानसभा में मुझे पूरा विश्वास है, हमारी बहनें आधे स्थान भर सकती हैं। कुल संख्या पाँच सौ में से अढ़ाई सौ महिलायें हो सकती हैं, यदि वे ऐसा ठान लें तो!
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः क्या आप उनको अनुमति देंगे?
डॉ. वी. पट्टाभी सीतारमैयाः जब राजकुमारी जी ने प्रांतीय आदर्श संविधान समिति के समक्ष यह कहा कि महिलाओं को किसी आरक्षण की आवश्यकता नहीं है तो मैंने उनकी प्रशंसा की थी। मैंने सोचा कि ऐसा वक्तव्य देना उनके लिए एक साहस का काम है और एक बड़ी जिम्मेदारी लेने का काम है। किन्तु अब मुझे मालूम हो गया है कि वे अपने हितों का ध्यान रख सकती हैं। यदि इस सभा की आधा दर्जन महिला सदस्य हमें पंजों के बल से खींच सकती हैं और हमें इस विधेयक पर विचार करने के लिए विवश कर सकती हैं, तो मैं हैरान हूँ कि तब हमारी स्थिति क्या होगी जब इस सभा में उनकी संख्या अढ़ाई सौ हो जायेगी। मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। यदि उनके