(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 211

196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चयन के समय भी मेरी बात सुनी जाती है, तो मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि मैं ऐसा ही करूंगा, यद्यपि श्री रोहिणी कुमार चौधरी चाहे जो कहें।

(इस समय उपाध्यक्ष महोदय ने कुर्सी खाली की, जिस पर बाद में श्री एस.वी. कृष्णामूर्ति राव (सभापति तालिका में से एक) आसीन हुए।)

इस सम्बन्ध में मैं एक छोटा-सा विवरण पढ़ने का प्रयास कर रहा हूँ जो मैंने 12 मार्च, 1949 के ‘पिक्चर पोस्ट’ से लिया हैःµ

फ्महिला की ओर से समानता के लिए एक अनवरत मांग आती है। समानता से उसका क्या अर्थ है? कम से कम भौतिक दृष्टि से उसके पास काफी बड़ा हिस्सा है। संभवतया नबे प्रतिशत विज्ञापन पूर्णतया उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। फिल्म निर्माताओं का कहना है कि वे 80 प्रतिशत फिल्में महिलाओं के लिए बनाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उपन्यास के प्रकाशक पूर्णतया महिलाओं के बारे में सोचते हैं। जहां तक कपड़ों का सम्बन्ध है, महिलाओं को तरह-तरह के वस्त्र उचित मूल्यों पर मिल जाते हैं, जबकि गरीब फटीचर आदमी किसी मलिन दुकान की खिड़की से कुछ अप्राप्य सूटों को देर तक टकटकी लगाकर देखता है और भारी मूल्य वसूल किये जाने के बारे में सोचता है। अब हमें दूरदृष्टा आंखों से भविष्य में झांकना चाहिये। महिला को समानता से अधिक मिला है और पुरुष किसी अविवाहित महिला का चाटुकार बन गया है जो उसी के टुकड़ों पर निर्भर है और हर चीज सुन्दर मानकर स्वीकार लेता है।य्

मैं अपनी बहनों को आश्वासन देता हूँ कि धीरज रखने से कोई नुकसान नहीं होगा। कुछ दिन पूर्व बनारस के एक स्वामी के साथ एक परंपरावादी मंच पर उपस्थित होने पर मुझसे पूछताछ की गई और जब मैंने वहां प्रभावती राजे को भी देखा, जो एक आश्चर्यजनक महिला कार्यकर्ता थी और वहाँ प्राचीन जोन आफ आर्क की तरह उपस्थित जनों का नेतृत्व कर रही थी, तो मुझे लगा कि ऐसा वह वहाँ की रूढि़वादिता के कारण कर रही है। मैं भी बुलाये जाने पर वहाँ गया और मैं एक घंटे बोला। तब मुझे विरोधी के मंच पर उपस्थित होने के लिए बुरा भी कहा गया। इस पर मैंने कहा, फ्उनसे बोलने का क्या लाभ है जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया है? मुझे उन्हें बदलना चाहिये जिन्होंने अपना धर्म नहीं बदला है।य् मैं इस नये हिंदू संहिता विधेयक के बारे में लोगों को शिक्षित करने में पूरा विश्वास रखता हूँ। आप को जल्दी नहीं मचानी चाहिए और यह मामला बहुमत के आधार पर तय करना चाहिये। अतः जब कभी ऐसा होता है, तो लोगों को शिक्षित करना हमारा कर्त्तव्य है। हमें जनता में शिक्षा का प्रचार करके नतीजा दिखाना चाहिये। आखिरकार आपने महत्वपूर्ण उद्योगों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया है। यह मद कहां चली गयी? पूंजीपतियों ने सफलता प्राप्त की और हमारे पास कोई धनराशि नहीं थी, इसलिए हमें मुंह की खानी पड़ी। मेरा विश्वास धीरज में है। किसी दिन स्थिति ठीक