(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 212

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हो जायेगी। अभी हम कोई भी राष्ट्रीयकरण करने से डरते हैं। हम जमींदारी समाप्त करने में आनाकानी कर रहे हैं। हम नदी परियोजनाओं को हाथ में लेने में आनाकानी कर रहे हैं। हम कुटीर उद्योगों का विकास करने में आनाकानी कर रहे हैं। हम यह सब इसलिए नहीं कर रहे हैं कि मुद्रास्फीति की आंखें हम पर लगी हुई हैं और हम यह सभी सुधार करने की स्थिति में नहीं हैं। हमारे सामने उलझनें और विसंगतियां हैं। जीवन, रेल यात्रा की तरह सुगम पथ नहीं है। यह भीड़-भाड़ में खराब सड़कों पर मोटर कार यात्रा की तरह है। मैं आप से पूछता हूँ कि क्या इस भव्य सभा के सदस्यों का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे अपने मतदाताओं को शिक्षित करने का उपयोगी और लाभप्रद कार्य करें। वर्ष 1878 में क्या हुआ, जब मताधिकार के विस्तार के पश्चात् राबर्ट लो ने कहा था, फ्आओ हम जायें और अपने मालिकों को शिक्षित करें।य् हमारे मालिक बाहरी हैं। हम मालिक नहीं हैं। मंत्री हमारे मालिक नहीं हैं। हम जैसा चाहें उनके साथ वैसा व्यवहार कर सकते हैं। हम उन्हें नहीं चाहते तो कल हम उनसे छुटकारा पा सकते हैं। यह हमारा अधिकार है और यह हमारा विशेषाधिकार भी है और हमारी सुरक्षा भी। अतः मैं कहता हूँ कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। सामाजिक सुधारों के मामलों में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ। मैं वर्ष 1898 में भी एक समाज सुधारक था, जब मैं बी.ए. कक्षा में पढ़ता था। यह बात 51 वर्ष पहले की है जब यहाँ उपस्थित जनों में से आधों का जन्म भी नहीं हुआ था। तब से समाज सुधार में मेरी रुचि बनी हुई है। मैं युवावस्था में ही ब्रह्म समाज के सुधारकों के प्रभाव में आ गया था और मैंने ईसाई धर्मप्रचारकों से भी सुधारवादी भावना ग्रहण की है, जिनके आधीन मैंने चौथी कक्षा से बी.ए. कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।

अतः महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि इस विषय में क्या किया जाये, अपितु महत्वपूर्ण बात यह है क हम इसे कैसे करने जा रहे हैं। हमें राजनैतिक पहलुओं को भी याद रखना होगा। कल आप मतदाता के समक्ष भी उपस्थित होने वाले हैं। लेकिन कल हमारी दशा यहाँ कितनी दयनीय थी। मैं कल यहां नहीं था_ अन्यथा मैंने नजारा अपनी आंखों से देखा होता। मैं अलवर गया हुआ था और पिछली रात को ही ग्यारह बजे वापस लौटा और सबसे पहले मेरी पत्नी ने मुझे यह बताया कि लाठीचार्ज हुआ था जिसमें कुछ लोग बुरी तरह जख्मी हुए। यों खबरों को एक से दूसरे को बढ़ा-चढ़ा कर बताया और सुनाया जाना स्वाभाविक है। पर मैंने आज अपने सामने जो नजारा देखा वह भी अत्यन्त कारूणिक है। आमतौर पर मैं आवेग या उत्साह में बोलता हूँ किन्तु आज मैं गैलरी में अपने सामने तीन महिला पुलिसकर्मियों को बैठे देख कर क्षोभ से बोला। क्या स्थिति इतनी खराब हो गई है कि गैलरी में और नीचे बैठी महिलाओं पर विश्वास नहीं किया जा सकता और यह सभा महिला पुलिस के डंडे के इशारे पर ही चल सकती है? क्या आपको वास्तव में इस बात पर गर्व है कि ये महिला पुलिस कर्मी हमारी बहनों पर संदेह करें? हमने काफी पुलिस कर्मी देखें हैं। आप जानते हैं कि यह इस विधेयक की सबसे बड़ी दुःखद घटना है। डाक्टर साहब इस की ओर ध्यान दें