198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि आप पुलिस के संरक्षण के बिना इस सभा में नहीं आ सकते, महिलायें, महिला-पुलिस कर्मियों और पुरुष, पुरुष-पुलिस कर्मियों के संरक्षण के बिना सभा में नहीं आ सकते, तो हमारी प्रगति, हमारा विधान और हमारी विधान-सभा संकट में पड़ जायेंगे। मुझे वास्तव में बड़ा
खेद है। अब मैं सामान्य टिप्पणियों को छोड़ता हूँ और एक या दो मुख्य मुद्दों पर आता हूँ जिनके साथ आज यहां हमारा सम्बन्ध हैं और उससे पूर्व मैं इस विधान के प्रजनकों के बारे में कुछ कहूंगा। मुझे अत्यंत खेद है कि इस विधेयक का पंथ-प्रदर्शन करने की जिम्मेदारी डॉ. अम्बेडकर पर डाली गई है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः मुझे कोई खेद नहीं है।
डॉ. वी. पट्टाभी सीतारमैयाः मैं जानता हूँ_ अन्यथा आप अपने स्थान पर इतने गर्व से न बैठे होते। डाक्टर साहब जानते हैं कि मैंने उनके बारे में क्या कहा है। मैंने अच्छाई या बुराई के लिए चाहे जो भी हो, उनकी दुर्दमनीय, अत्यन्त सम्मोहक, अविजेय भावना का उल्लेख किया है। हम सदैव यह कहना चाहते हैं कि उनमें सद्भावना तो है और इसलिए हम उनकी सराहना करते हैं किन्तु इसके साथ ही, उनका समाज के साथ तारतम्य नहीं हो पाया है।
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः उनका तारतम्य पूरा है। परिपूर्ण तारतम्य!
डॉ. वी. पट्टाभी सीतारमैयाः मैं उन्हें मानवद्वैषी नहीं मानता, किन्तु वह सामान्य मानव नहीं है, मैं इतना ही कह सकता हूँ। प्रशिक्षण, परिवेश, वातावरण, संस्कृति इन सभी के फलस्वरूप उनका राष्ट्र की भावना के साथ तारतम्य स्थापित नहीं हो पाता। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह हमारे एक उत्कृष्ट बुद्धिजीवी हैं और मैं चिरकाल तक उनके स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करता हूँ। किन्तु इस सबका अर्थ यह नहीं है कि हम उनके दृष्टिकोण से सहमत हैं। हमने समान नागरिक कानून पारित किया, तो भी हमारा उनसे मतभेद रहा। हममें से कुछ ने निरर्थक अपनी पूरी शक्ति से उसका विरोध किया। अब मैं आपको एक ऐसी बात याद दिलाता हूँ जो मैंने पहले दिन कहा, जब यह विधेयक इस सभा में प्रस्तुत किया गया। मुझे आशा है बहुत से लोग उसे भूल गये हैं, इसलिए मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसकी पुनरावृत्ति के लिए उन्हें मुझे दोष नहीं देना चाहिये। वास्तव में मैं स्वयं मुख्य बिन्दू भूल गया हूँ। वह मुद्दा यह था कि इस देश में समाज सुधार का कार्य मध्यस्थता के माध्यम से, परामर्श के माध्यम से और एक सामाजिक परिषद जिसका हमें गठन करना चाहिये, की प्रेरणा के माध्यम से किया जाना चाहिये। उस समय मैंने इंग्लैण्ड की फ्चर्च परिषदय् का उदाहरण दिया था, जिसमें गिरजाधर की महान् विभूतियां शक्ति का मुख्य तत्व होती हैं और जीवन या विधि में परिवर्तनों के द्वारा वे जो कुछ भी लाती हैं हाउस आफ कामन्स उन्हें विराम या अर्ध-विराम बदले बिना स्वीकार कर लेता है और धार्मिक या सामाजिक मामलों में ऐसा ही होना चाहिये। हमें भी यही रास्ता अपनाना