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सकता है मुझे भगवान में आस्था न हो, किन्तु यह कैसे हो सकता है कि मैं प्रगति के भगवान में आस्था न रखूं जैसा कि पश्चिम में होता है?
मैं आपको यह भी बताऊंगा कि पहली महिला-वक्ता ने यह क्यों कहा कि मैं एक प्रगतिक्रियावादी हूँ। यह एक बड़ी दिलचस्प कहानी है। किन्तु आपको मुझे आश्वासन देना होगा कि आप हँसकर मेरी बात में व्यवधान नहीं डालेंगे। मैं मूलभूत अधिकार समिति का अध्यक्ष था। मूलभूत अधिकार समिति में यह प्रस्ताव लाया गया कि परदा न करना महिलाओं का मूलभूत आधार होना चाहिये। निस्संदेह, मैं इस पक्ष में हूँ क सब महिला परदा न करें, अन्य पुरुष क्या इसका पक्ष नहीं लेंगे? मैं उन लोगों की प्रशंसा करता हूँ जो इसका पक्ष नहीं लेते, किन्तु मैं उन प्रशंसनीय लोगों में नहीं हूँ। मैंने कहा मुझे इस खंड को मूलभूत अधिकारों में शामिल करने पर कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते सभी तरह के परदे खत्म हो जाएँ। प्राचीन परदे और आधुनिक परदे। आप दिल्ली शहर की एक परक्रिया कीजिये। यहाँ एक महिला का चेहरा देख पाना कठिन है। उसके चेहरे पर हमेशा परदा लगा रहा है। ( एक माननीय सदस्यः पाउडर।) यदि प्राचीन परदे को समाप्त किया जाना है तो आधुनिक परदे को भी हटाना होगा क्योंकि आधुनिक नकाब, परदे की अपेक्षा ज्यादा पूर्ण होता है। आप अपनी इच्छानुसार परदा हटा सकते हैं, किन्तु नकाब को घर पर ही हटाया जा सकता है और उसे हटाने के लिए कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करना पड़ता है।
आप मुझे गलत न समझ लें, इसलिए मैं आपको बताता हूँ कि मैं इंसानों की समानता में विश्वास रखता हूँ। और मानवता में महिलायें भी आती हैं। मैं चाहता हूँ कि यह विधेयक पारित हो, क्योंकि यह हमें पुरुषों और महिलाओं में समानता लाता है। मैं समझता हूँ कि यह विधेयक हमारी समानता के हित में है। मैं हमेशा यह समझता रहा हूँ कि महिलाओं की तुलना में हम बहुत ज्यादा घाटे में हैं। सर्वप्रथम प्रकृति ने हमें घाटे में डाला है। क्योंकि आप जरा भी सोचें तो आप स्वीकार करेंगे कि हर वह चीज, जो पुरुष कर सकता है, एक महिला भी कर सकती है। किन्तु कुछ चीजें ऐसी हैं जो महिलायें कर सकती हैं किन्तु पुरुष नहीं कर सकते। पुरुष वे चीजें करने की कल्पना भी नहीं कर सकते, स्वप्न में भी नहीं। मैं तो सोच भी नहीं सकता।
कुछ माननीय सदस्यः बेशक, आप नहीं सोच सकते।
आचार्य जे.बी. कृपलानीः मैं बौद्धिक अर्थ में सोचने की बात कर रहा था। चूंकि आप मेरा अर्थ जान चुके हैं, मुझे इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है ( एक माननीय सदस्यः ओह, नहीं_) किन्तु मेरी जिज्ञासा रही है महिलाओं से यह पूछा भी है फ्यह मर्मांतक पीड़ा क्या होती है और गर्भधारण में आपको कौन-सा बड़ा आनन्द मिलता है?य् इस पर वे मेरी अज्ञानता पर मुस्कुरा देती हैं और कोई उत्तर नहीं देतीं। मैंने उनसे यह भी पूछा कि छाती से लगाकर बच्चे का पालन करने में उन्हें क्या आनन्द मिलता