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उसके साथ जो पुरुष चल रहा होता है, आजकल वह उसके कुछ पीछे चलता है, उससे अच्छी दिखाई देती हैं। जो लोग आज के भारतीय मध्यम वर्गीय समाज से परिचित नहीं हैं या विदेशी हैं, उन्हें लग सकता है कि शायद कोई चपरासी पीछे आ रहा है। अतः महोदय, मेरा कहना है कि उनकी अपनी सम्पत्ति हो, हमें इन चीजों से कोई परेशानी नहीं होगी। वे अपनी इच्छानुसार इसे खर्च कर सकेगी और मुझे विश्वास है कि उनके द्वारा चीजें खरीदने का बिल हमें आता है। तब वे किफायत से खर्च करेंगी, क्योंकि अभी अतः मैं इस प्रबल पक्ष में हूँ कि महिलाओं का सम्पत्ति में हिस्सा होना चाहिये।
एक और मुद्दा भी है जो मैं विशेष रूप से उठाना चाहता हूँ। मुझे बताया गया है कि आप एक लड़की को गोद नहीं ले सकते। मैं दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में हूँ कि मेरा कोई बच्चा नहीं है।
श्री बी.एल. सोंधीः कितनी खेद की बात है?
आचार्य जे.बी. कृपलानीः यह बड़ा खेद का विषय है। मैंने सोचा कि एक हिंदू के नाते मैं एक बच्चे को गोद ले सकता हूँ। किन्तु मेरी सदैव यह प्राथमिकता रही कि मैं किसी कन्या को गोद लूँ। मैंने कुछ कन्याओं को गोद लिया, किन्तु वे अपने पतियों के साथ चली गईं। फिर भी मैं एक लड़की को गोद लेना चाहता हूँ। मेरी समझ में नहीं आता कि ऐसा प्रावधान क्यों है कि आप किसी लड़की को गोद नहीं ले सकते। जहां तक पिता का सम्बन्ध है, उसे लड़कों की अपेक्षा लड़कियां अधिक प्रिय लगती हैं और लड़की जितनी अधिक ढीठ और अक्खड़ होगी पिता उसे उतना अधिक प्यार करेगा। अतः मैं अनुरोध करता हूँ कि यदि इस विधेयक में कोई त्रुटि है, तो उसे सुधार लिया जाये और कन्याओं को गोद लेने की भी अनुमति दी जाये।
महोदय, जहां तक तलाक का सम्बन्ध है, मैं आपको बताना चाहता हूँ, कि व्यक्तिगत रूप में मेरा इससे कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि मेरा विवाह आपराधिक नहीं अपितु वैधानिक था। अतः मैं स्वयं नहीं मेरी पत्नी निश्चित रूप से किसी समय मुझे तलाक दे सकती है, यदि वह महसूस करती है कि मैं उसके साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहा। किन्तु मैंने देखा कि जहां तक तलाक सम्बन्धी प्रावधानों का सम्बन्ध है, यह विधेयक पुरानी प्रथा से अधिक अधोगामी है। जैसा कि हमें श्री अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर तथा एक महिला वक्ता ने बताया है, गांवों के लोगों में तलाक की बड़ी साधारण प्रथा प्रचलित है। वहां कोई महंगी कार्यवाही नहीं होती, कोई कांड नहीं होता, कोई समाचार-पत्रों में लेख नहीं छपते। इन सभी चीजों से वे दूर रहते हैं। महोदय, मैं सुझाव दूंगा कि तलाक के मामले में अधिक न्यायसंगत, अधिक वैज्ञानिक और अधिक आधुनिक रवैया अपनाया जाये।
महोदय, मैं एक सुझाव और देना चाहता हूँ जिस पर विधि मंत्री को विचार करना चाहिये। इस सुझाव से न तो कोई व्यय होगा और न ही इसका सम्बन्ध मुकद्मेबाजी, कांड