210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
या समाचार-पत्रों में छपने वाले लेखों से है। सभी विवाह पांच वर्षों के लिए होने चाहिये और पांच वर्ष पूरे होने पर हर विवाह की अवधि बढ़ाने पर विचार किया जाना चाहिए। किसी गांव में ग्राम अधिकारी अथवा शहर या नगर में उसके सामान्तर अधिकारी के समक्ष किसी घोषणा द्वारा विवाह की अवधि बढ़ाई जा सकती है, अतः पांच वर्ष बाद आप जाकर यह कह सकते हैं कि आप अलग नहीं होना चाहते और विवाह जारी रहेगा।
इससे तलाक आसान और वैज्ञानिक हो जायेगा, कोई कांड या मुकदमेबाजी नहीं होगी और मैं आप को बता दूं कि यह अति आधुनिक होगा। मैं यह सुझाव दे रहा हूँ जिसके योग्य यह विधयेक है और मैं आपको बता दूं कि यह प्रगति और उन्नति के नये धर्म की सभी अपेक्षाओं को पूरा करता है।
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः महोदय, क्या मैं आपसे अनुरोध कर सकता हूँ कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि कई माननीय सदस्य इस विधेयक पर बोलना चाहते हैं, इस पर चर्चा के लिये एक दिन और रखा जाये। माननीय प्रधानमंत्री यहां बैठे हैं और वह हमें बता सकेंगे कि सरकार चर्चा के लिए कल का दिन भी देने के लिए तैयार है या नहीं।
माननीय श्री जवाहर लाल नेहरू (प्रधानमंत्री)ः महोदय, संसद जानती है कि उसके लिए हर दिन और हर घंटे से अधिक कीमती कोई चीज नहीं है। इस सत्र में विचार के लिए हमारे पास बहुत-सा अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है और अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। बहरहाल, जैसा कि मैंने पहले स्पष्ट किया है, हम इस चर्चा को चलाने के लिए पूरा अवसर देना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि यथासंभव अधिक से अधिक सदस्य इस चर्चा में भाग लें। स्वाभाविक है कि अन्य सरकारी काम को नुकसान पहुंचाकर अनिश्चित समय तक यह या कोई अन्य चर्चा जारी नहीं रखी जा सकती। अतः सरकार ने कहा है कि वह यथासंभव अधिक से अधिक समय देना चाहती है लेकिन यह चर्चा समाप्त होनी चाहिये। मैं दो शर्तों पर सरकार की ओर से एक और दिन अर्थात् कल का दिन इस चर्चा के लिए देने के लिए पूरी तरह तैयार हूँः एक शर्त यह है कि चर्चा कल समाप्त हो जायेगी, दूसरे हम सदन का अन्य काम करने के लिए शनिवार हो भी बैठेंगे।
श्री महावीर त्यागीः महोदय, क्या मैं यह सुझाव दे सकता हूँ कि शनिवार को बैठना हमारे लिए बहुत कठिन है। माननीय प्रधानमंत्री तो समय निकाल लेंगे, क्योंकि उन्हें संसद में अधिक समय नहीं देना होता। किन्तु हमें सुबह से शाम तक बैठना होता है और शाम को अपने अन्य कार्यों को निपटाने के अलावा प्रवर समितियों की बैठकों में भाग लेना होता है। हमें जो विभिन्न दस्तावेज प्राप्त होते हैं उनको भी देखना होता है, संशोधन तैयार करने होते हैं और उन्हें भेजना होता है। शनिवार और रविवार ही दो ऐसे दिन होते हैं, जब हम यह कार्य कर सकते हैं। महोदय, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि शनिवार को सभा की बैठक न बुलाई जाये।
पंडित गोविन्द मालवीय (यू.पीः सामान्य)ः महोदय, मैं यह कहना चाहता हूँ कि