(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 227

212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ऽहिंदू संहिताµजारी

माननीय उपाध्यक्षः मुझे श्री कृपलानी से एक पत्र मिला है कि वह एक गलतफहमी होने पर बैठे गये थे। मैंने सोचा कि उन्होंने अपना भाषण समाप्त कर दिया है। उनका कहना है कि ज्यों ही मैं खड़ा हुआ पीठ की इच्छा को ध्यान में रखते हुए वह बैठ गए। यदि ऐसी बात है तो मैं उनका अपना भाषण जारी रखने का एक अवसर देना चाहूंगा। किन्तु मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वह थोड़े समय में ही अपना भाषण समाप्त कर दें।

ऽऽआचार्य जे.वी. कृपलानी (संयुक्त प्रांतः सामान्य)ः महोदय, आपने मुझे अपने भाषण के निष्कर्ष के लिए जो अवसर दिया है उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। मैं इसे अधिक गंभीर ढंग से पूरा करना चाहता हूँ। मुझे प्रतीत होता है कि एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास हास्य का अभाव है इसीलिए हम हास्य के पीछे के गम्भीर उद्देश्य की गहराई तक नहीं जा पाते।

मैं विधेयक का हृदय से समर्थन करता हूँ और इसके ठोस आधार हैं। इसका आधार भारत की महिलाओं के चरित्र और परम्परा की नींव है। पूरे इतिहास में हमारे जीवन और हमारी संस्कृति में उनका काफी उत्कृष्ट स्थान रहा है। प्राचीन नामों में हमारे पास कुछ प्रसिद्ध नाम हैं जिन्होंने समयानुसार कई विधाओं में योगदान किया है। उनमें से बहुत-सी महान लेखक, दार्शनिक और कवियत्री थीं। मध्यकालीन युग में जब हम पराजित और निष्कासित हो चुके थे, जब एक के बाद एक विदेशी आक्रमण हुआ, हमारी महिलाओं ने घर संभाला तब भी उनके प्राचीन सद्गुणों में कोई कमी नहीं आई। और जब जख्मी और निराश होकर हम घर पहुंचे तो उन्होंने हमारे जख्मों को कम किया और घर का चूल्हा जलाये रखा। उन्होंने हमें सांत्वना दी। इतना ही नहीं, उन्होंने हमारे धर्म को जीवित रखा। उन्होंने हमारी परम्पराओं को जीवित रखा_ उन्होंने हमारी सांस्कृति को जीवित रखा। हिंदू घरों में हिंदू महिलायें होने के कारण ही हम आज देखते हैं कि हमारी संस्कृति और हमारा धर्म अपने चरमोष्कर्ष पर है। आज भी जब पुरुष अपनी पोशाकें बदलते हैं, हमारी महिलाएं अपनी पोशाकें नहीं बदलतीं। भारत की महिलाओं की इसी विशेषता को ही राष्ट्रपिता ने पहचाना था और उन्होंने इसका बड़ी कुशलता से उपयोग किया था।

हमारे स्वाधीनता संग्राम में वे हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी हुइंर्। मैं जानता हूँ कि कई बार उन्हें हम से अधिक कष्ट उठाना पड़ता था। जब उनमें से कुछ को लाठी चार्ज का सामना नहीं करना पड़ा और जेल नहीं जाना पड़ा, तो भी मैं जानता हूँ कि उन्हें किन दिकक्तों का सामना करना पड़ा और उन्होंने उनका भी खुशी से सामना किया। उन्होंने हमेशा हर तरह से हमारी सहायता की है और मैं समझता हूँ हमें यह सोचना शोभा नहीं

ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 14 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 560-62

ऽऽवही, पृष्ठ 560-62