214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फैशनेबिल भी समझा जा सकता है किन्तु जब मैं उनके घर जाता हूँ तो मैं देखता हूँ कि वे ममता के साथ अपने पतियों, अपने बच्चों और अपने भाइयों से प्यार करती हैं।
एक माननीय सदस्यः इतनी ममता क्यों?
आचार्य जे.बी. कृपलानीः मैंने जानबूझ कर इस शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि आप नहीं जानते कि उनका यह प्यार हम पुरुषों के लिए बहुत असुविधाजनक भी है। हम घर पर भी चाहे जितना अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश करें और अपनी बात मनवाने का प्रयास करें_ वे हमारे इर्द-गिर्द इस प्रकार घूमती हैं और इतनी लगन, निष्ठा, दृढ़ता तथा धीरज से सेवा करती हैं कि भारतीय पति इस कदर जोरू के गुलाम हो जाते हैं और मैंने देखा है कि विश्व में कहीं भी पति अपनी पत्नियों के इस कदर गुलाम नहीं होते। वे सदैव उनको वश में करने का प्रयास करती हैं। मैंने देखा है कि ये आधुनिक महिलायें हमारी तरह काफी शिक्षित हैं और मैंने देखा है कि मूलरूप में वे उतनी ही प्राचीन हैं, जितनी कि उनकी प्राचीन बहनें थी। मैं उन लोगों की सोचता हूँ जिनका विवाह पुरानी रूढि़वादी महिलाओं से हुआ है और जिन्होंने उनकी लगन को देखा है, यदि वे नई महिलाओं की भक्ति को देखें तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य होगा कि उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है_ और ये महिलायें चाहती हैं कि उनकी कुछ अयोग्यतायें दूर हों। कहा जाता है कि महिलाओं को उत्तराधिकार दिया जाये तो भाइयों और बहनों का प्यार कम हो जायेगा। मैं नहीं समझता कि हमारी बहनों का प्यार इतना थोथा है। इसके पीछे शताब्दियों की परम्परा है। मैंने बहनों को इसलिए गुलाम बनते देखा है कि उनके भाई शिक्षा पा सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सकें। मैंने उन्हें परिवार के लिए त्याग करते देखा है। मेरा सम्बन्ध ऐसे समुदाय से है जहां संयुक्त परिवार प्रथा नहीं है, जहां बेटा विवाह होते ही वह अलग हो जाता है और अलग रहने लगता है किन्तु मैं जानता हूँ कि संयुक्त परिवार न होने पर भी परिवार के सदस्यों में काफी प्यार है। (बहुत अच्छे!) और इसका प्रमाण हमें तब मिला जब सिंधियों को सिंध छोड़कर भारत आना पड़ा। मैंने तीन या चार परिवारों को एक घर में एक साथ रहते देखा है। यदि किसी का घर बाहर था, यदि कोई सिंध से बाहर बस गया था और वह भारत में रहता था तो उसके घर में उसके भाई-भतीजे और ससुराल के लोग समान रूप से मिलजुल कर रहते थे और इस भीड़-भाड़ से होने वाले कष्ट को वे बड़ी खुशी सहन करते थे। तब कई लोगों को काफी धनराशि भी खर्च करनी पड़ी। अतः यह पारिवारिक स्नेह जो शताब्दियों से चल रहा है, समाप्त नहीं होगा क्योंकि हिंदू विधि में केवल मामूली परिवर्तन किया जा रहा है।
जैसा कि श्री अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ने हमें बताया है, इस कानून में सदा परिवर्तन होता रहा है। हिंदू धर्म के लिए यह गर्व की बात है कि इसने बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढाला है। यह प्राचीन होते हुए भी इतना नवीन है जितना कि इसे समाज के स्वस्थ जीवन के लिए होना चाहिये। समय बदल गया है।