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यदि यहां विदेशी शासन न होता तो हमारे शास्त्र बदल गये होते, हमारा कानून बदल गया होता। विदेशी शासन ने इन नियमों को काफी कठोर बना दिया, और अब समय आ गया है कि हम उनमें कुछ नया जीवन लायें और नई रोशनी लायें और इस विधेयक का भी यही उद्देश्य है। मुझे आशा है कि विधेयक को समिति में एक विशेष रूप दिया जायेगा और कोई शिकायत नहीं होगी। मुझे विश्वास है कि हमारे घरेलू जीवन में कोई गड़बड़ नहीं होगी और हमारी महिलाओं के प्रेम और भक्ति में कोई कमी नहीं आयेगी। पुरुषों के प्रति उनकी अनुरक्ति में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आयेगी और भारत की भावी महिला अपने घर तथा देश दोनों के ही प्रति समर्पित रहेगी। महोदय, मैंने वक्तव्य पूरा कर दिया है।
ऽश्री गोकुलभाई दौलतराम भट्ट (बम्बई प्रांत)ः माननीय महोदय, हिंदू कोड बिल जब से पेश हुआ है तब से हिंदुस्तान में एक हलचल पैदा हो गई है। डाक्टर सेन ने कहा है कि यह विधेयक 50 या 60 वर्ष पहले से ही हमारे सामने है। किन्तु मैंने जो किताबें पढ़ी हैं उनसे यह पता नहीं चलता कि यह संहिता पहले कभी आई थी। यद्यपि हिंदू कानून था और उसमें जब तक परिवर्तन होते रहे हैं जिससे हिंदू समाज का ध्यान खिंचा है। इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन जिस शक्ल में यह हिंदू संहिता विधेयक है वह हमारे सामने सन् 1939 के बाद आया है। और उसके पहले डॉक्टर देशमुख ने जब 1938 में विवाह-विधेयक इसी सदन में पेश किया था, तो उस समय कुछ चर्चा चली थी।
डॉ. पी.के. सेन (बिहारः सामान्य)ः क्या मैं स्पष्ट कर सकता हूँ? मैंने कहा था कि यह 60 वर्षों से अधिक अर्थात् 1856 या 1855 से विधानसभा के समक्ष रहा है। किन्तु वह विवाह विधि के संबध में था, न कि किन्हीं अन्य पहलुओं के संदर्भ में था।
श्री गोकुलभाई दौलतराम भट्टः मैं भी यही कहता हूँ कि इसमें से कुछ-कुछ विषय सामने थे, हिंदू समाज के सामने थे, और ऐसे विषय सिर्फ हिंदू समाज ही के सामने नहीं थे, लेकिन पारसियों के सामने थे और मुसलमानों के भी सामने थे। मेरा कहना यह है कि यह हिंदू संहिता विधेयक जिस रीति से लाया गया है और जिस तरह से एक समिति, जिसे राउ समिति कहते हैं, बनी उसका थोड़ा-सा इतिहास आप देख लीजिये और मैं आपको यह भी दिखाना चाहता हूँ कि हिंदू समाज, जिसकी आबादी करीब तीस करोड़ है, उसकी व्यवस्था के लिए जो कायदे-कानून बनाये जाते हैं, उसके लिये कैसे समय निश्चित होता है, उसका प्रचार तरीका क्या होता है, लोकमत कैसे जाना जाता है और प्रतिक्रिया जानने के लिये कौन-से तरीके अपनाएं जाते हैं। हिंदू संहिता विधेयक आना चाहिये या नहीं आना चाहिये, हिंदूसमाज सुदृढि़कृत होना चाहिये या नहीं होना
ऽसंविधान सभा (विधायी) डी., खंड 6, भाग II, 14 दिसम्बर, 1949, पृष्ठ 576-85